14 अगस्त 2022. सारा देश स्वतंत्रता दिवस के जश्न की तैयारियों में जुटा हुआ था. इसी शाम हल्द्वानी में रहने वाली 65 साल की शांति देवी को एक फोन कॉल आया. ऐसा फोन कॉल, जिसका इंतज़ार उन्हें बीते 38 सालों से था. फ़ोन कॉल जो उन्हें उनके फ़ौजी पति लांस नायक चंद्रशेखर की कोई सूचना दे सके. क्योंकि 38 साल पहले जब उनके पति ऑपरेशन मेघदूत के लिए रवाना हुए थे तो उन्होंने शांति देवी से वादा किया था कि ‘मैं जल्द ही लौट आऊँगा.’ लेकिन न तो वो कभी वापस लौट सके और न ही उनके पार्थिव शरीर की कोई जानकारी इतने सालों में शांति देवी तक पहुंची.
अब 38 साल बाद एक फ़ोन कॉल पर उन्हें बताया गया कि उनके पति का पार्थिव शरीर सियाचिन में एक बंकर में मिला है और दो दिन बाद हल्द्वानी पहुँचाया जा रहा है.
यह सूचना मिलते ही शांति देवी ने अपनी बेटियों को इसकी जानकारी दी. लांस नायक चंद्रशेखर जब घर से गए थे तो उनकी बड़ी बेटी की उम्र 4 साल थी और छोटी बेटी की उम्र सिर्फ डेढ़ साल. अपने बहादुर पिता के क़िस्से सुनते हुए बड़ी हुई दोनों बेटियों को ताउम्र ये ग़म रहा था कि उनके होश संभालने से पहले ही उनके पिता हमेशा के लिए उन्हें छोड़ गए. अब 38 साल बाद पिता का पार्थिव शरीर उनके सामने आ रहा था.
लांस नायक चंद्रशेखर 19 कुमाऊँ रेजीमेंट के जाँबाज़ सिपाही थे. ये वही रेजिमेंट है जिसने सियाचिन को फतह कर वो कारनामा कर दिखाया था कि पूरी दुनिया ने इसके साहस को सलाम किया. 1984 में सियाचिन को पाने के लिए जब ऑपरेशन मेघदूत की रणनीति बनी तो कुमाऊँ रेजिमेंट को ही इस चुनौती के लिए चुना गया.
ये बात अप्रैल 1984 की है. सुबह के पाँच बजकर 30 मिनट का समय था. कैप्टन संजय कुलकर्णी के साथ एक सैनिक को लिए हुए चीता हेलिकॉप्टर ने बेस कैंप से उड़ान भरी. उसके पीछे दो हेलिकॉप्टर और उड़े. दोपहर तक स्क्वॉर्डन लीडर सुरिंदर बैंस और रोहित राय ने ऐसी कुल 17 उड़ानें और भरीं. कैप्टन संजय कुलकर्णी के साथ एक जेसीओ और 27 भारतीय सैनिकों को उस दिन सियाचिन में बिलाफ़ोन्ड ला के पास हेलिकॉप्टर से नीचे उतारा गया. उस दिन विज़िबिलिटी बेहद कम थी और तापमान माइनस 30 डिग्री से भी नीचे.
बिलाफ़ोन्ड ला में हेलिकॉप्टर्स से उतारे जाने के तीन घंटे के भीतर रेडियो ऑपरेटर हाई एल्टीटयूड पुल्मोनरी एडिमा यानी हेप के शिकार हो गए थे. हालांकि इससे भारतीय दल को एक तरह से फ़ायदा ही हुआ क्योंकि रेडियो ऑपरेटर की अनुपस्थिति में पूरा रेडियो साइलेंस बरता गया और पाकिस्तानियों को वहां भारतीय सैनिकों होने की भनक तक नहीं लग पाई.
क़रीब 23 हजार फ़िट यानी सात हजार मीटर की ऊंचाई पर 75 किलोमीटर लंबे और क़रीब दस हज़ार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले सियाचिन ग्लेशियर का इलाक़ा बेहद दुर्गम है. इसे ऐसे समझिए कि दुनिया के सबसे ऊंचे पहाड़ माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई लगभग 8849 मीटर है. सियाचिन का ये युद्धक्षेत्र उससे सिर्फ़ 1500 मीटर ही कम है. ये इलाका इतना जानलेवा है कि भारत और पाकिस्तान दोनों ने 1972 तक इसकी सीमा के बारे में स्पष्टीकरण देने की ज़रूरत ही नहीं समझी थी. लेकिन भारत का माथा तब ठनका जब 70 के दशक में कुछ अमरीकी दस्तावेज़ों में एनजे 9842 से आगे कराकोरम रेंज के क्षेत्र को पाकिस्तानी इलाक़े के रूप में दिखाया जाने लगा. भारत को ये भी पता चला कि पाकिस्तानी इस इलाक़े में पश्चिमी देशों के पर्वतारोहण दल भी भेज रहे हैं ताकि इस इलाक़े पर उनका दावा मज़बूत हो जाए. इसी दौरान भारतीय खुफिया एजेंसी को एक ऐसी जानकारी मिली, जिससे आलाधिकारियों में हड़कंप मच गया. 80 के दशक में रॉ के जासूसों को पता चला कि पाकिस्तान जर्मनी से ऊंचाई पर रहने के लिए ख़ास तरह के कपड़े ख़रीद रहा है.
रॉ के प्रमुख रहे विक्रम सूद उस ज़माने में श्रीनगर में तैनात थे. उन्होंने ख़ुद 15 कोर के बादामी बाग़ मुख्यालय में जा कर वहां के कमांडर लेफ़्टिनेंट जनरल पीएन हून को पाकिस्तान की ताज़ा गतिविधियों से अवगत कराया था. एयर वाइस मार्शल अर्जुन सुब्रमणियम अपनी किताब ‘फ़ुल स्पेक्ट्रम इंडियाज़ वार्स 1972-2020’ में लिखते हैं कि पाकिस्तान ने 1983 की सर्दियों में बिलाफ़ोन्ड ला पर नियंत्रण करने के लिए मशीन गन और मोर्टार से लैस अपने सैनिकों का एक छोटा दल भेजा था. लेकिन मौसम इतना खराब हुआ कि ये दल सफल नहीं हो पाया.
पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ भी उस ज़माने में वहां तैनात थे. उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘इन द लाइन ऑफ़ फ़ायर’ में लिखा है, ‘हमने सलाह दी कि हम वहां मार्च में जाएं लेकिन उत्तरी क्षेत्र के जनरल ऑफ़िसर कामांडिंग ने ये कह कर मेरी सलाह का विरोध किया कि दुर्गम इलाक़ा और ख़राब मौसम होने के कारण हमारे सैनिक वहां मार्च में नहीं पहुंच सकते. उनकी सलाह थी कि हम वहां पहली मई को जाएं. वो चूंकि कमांडर थे इसलिए उनकी बात मानी गई. यहीं हमसे ग़लती हुई. हम जब वहां पहुंचे तो भारतीयों ने वहां पहले से ही ऊंचाइयों पर कब्ज़ा जमाया हुआ था.’
सियाचिन पर कब्जे के इसी ऑपरेशन को ऑपरेशन मेघदूत नाम दिया गया था. इसके लिए जिन फौजियों को चुना गया, लांस नायक चंद्रशेखर हर्बोला भी उनमें से एक थे. वो एक ऐसे 20 सदस्यीय दल का हिस्सा थे जो एवलांच की चपेट में आ गया था. इनमें से 15 जवानों के शव तो भारतीय सेना के बचाव दल को मिल गए थे लेकिन पांच शव बरामद नहीं हुए थे. इस घटना के 38 साल बाद हाल ही में भारतीय सेना की पेट्रोलिंग टीम को सियाचिन के एक बंकर में एक शव मिला. यूनिफ़ॉर्म पर लगे मेटल बैच से पेट्रोलिंग टीम यह पहचान कर पाने में सफल रही कि यह शव अमर शहीद लांस नायक चंद्रशेखर हर्बोला का है.
कुमाऊँ रेजिमेंट के इस योद्धा और पहाड़ के इस जांबाज सिपाही का पार्थिव शरीर 17 अगस्त के दिन हल्द्वानी पहुंचा जहां चित्रशाला घाट पर पूरे सैन्य सम्मान के साथ उनके अंतिम विदाई दी गई. उनकी बेटियों ने अपने बहादुर पिता को मुखाग्नि दी.
स्क्रिप्ट: मनमीत