उत्तराखंड की पुलिस व्यवस्था पर कई सवाल खड़े करता अंकिता हत्याकांड

  • 2022
  • 7:53

हजारों देवियों के वास उत्तराखंड में महिलाओं की सुरक्षा व्यवस्था कितनी लचर है, ये अंकिता भंडारी हत्याकांड से समझा जा सकता है. पौड़ी से रोजगार की तलाश में चली अंकिता भंडारी की पैसों के नशे और सत्ता की हनक में डूबे कुछ लोगों ने हत्या कर दी. आरोप है कि रिजॉर्ट चलाने वाले एक भाजपा नेता के बेटे ने अंकिता को जिस्मफ़रोशी के धंधे में धकेलने पर मजबूर किया. लेकिन अंकिता ने जब इसका विरोध किया तो पुलकित नाम के इस आरोपित ने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर उसकी हत्या कर दी.

पांच दिनों तक अंकिता के पिता अपनी बेटी को तलाशने के लिये राजस्व पुलिस के आस पास भटकते रहे. लेकिन मामला तब खुला, जब इसकी जाँच पुलिस को ट्रान्स्फ़र हुई. पुलिस ने रिजॉर्ट के मालिक पुलकित और उसके साथियों से पूछताछ की तो ऐसे तथ्य सामने आए जिनसे पूरा राज्य शर्मसार हुआऔर आक्रोशित जनता सड़कों पर उतर आई. शुक्रवार शाम को देहरादून समेत कई इलाकों में लोगों ने कैंडल मार्च भी निकाला.

अंकिता के बड़े भाई अजय सिंह भंडारी एक कंपनी में ट्रेनी के तौर पर काम कर रहे हैं. अजय सिंह ने बताया कि अंकिता ने पौड़ी के बीआर मॉडर्न स्कूल से इंटरमीडिएट की परीक्षा 89 पर्सेंट मार्क्स के साथ पास की थी. वो एक मेधावी छात्र थी लेकिन कोरोना की पहली लहर के दौरान जब उसके पिता की सुरक्षा गार्ड की नौकरी चली गई तो अंकिता को घर की आर्थिक स्थिति की चिंता सताने लगी. तभी उसने नौकरी करने का फैसला किया.

अजय सिंह भंडारी ने बताया कि अंकिता को वनंत्रा रिजॉर्ट में नौकरी करते हुए महज एक महीना ही हुआ था. लेकिन इसी दौरान रिजॉर्ट का मालिक पुलकित आर्य, जिसके पिता भाजपा सरकार में दर्जाधारी मंत्री रह चुके हैं, वो अंकिता को रिजॉर्ट में आने वाले मेहमानों को कथित एक्स्ट्रा सर्विस देने के लिए दबाव डालने लगा. अंकिता पहले समझ नहीं पाई कि ग्राहकों को एक्स्ट्रा सर्विस देना का क्या मतलब है?

लेकिन जब उसे इस बारे में मालूम हुआ तो उसने इसका विरोध किया और अपने कुछ साथियों को भी इस बारे में बताया. आरोप है कि पुलकित आर्य और उसके साथियों ने इसी के बाद अंकिता की हत्या की साज़िश की. उन्होंने अंकिता को चीला बैराज में धकेल दिया और फिर ख़ुद ही राजस्व पुलिस में अंकिता की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करवा दी. पांच दिनों तक जब राजस्व पुलिस के पटवारी हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे तो और तमाम सोशल मीडिया platforms पर ये मामला बढ़ने लगा तब जाकर इसकी जाँच राजस्व पुलिस से रेगुलर पुलिस को ट्रान्स्फ़र किया गया.

पुलिस जांच में सीसी टीवी कैमरों को खंगाला गया तो पहला शक पुलकित पर ही गया. रिज़ॉर्ट के स्टाफ़ ने पुलिस को बताया कि 18 सितंबर की शाम करीब आठ बजे अंकिता रिजॉर्ट के मालिक पुलकित आर्य, मैनेजर अंकित और भास्कर के साथ रिजॉर्ट से बाहर गई थी. रात के क़रीब साढ़े दस बजे ये तीनों तो रिजॉर्ट में लौट आए लेकिन अंकिता उनके साथ नहीं थी. इस आधार पर पुलिस ने जब तीनों को हिरासत में लेकर पूछताछ की तो उन्होंने पूरा घटनाक्रम उगल दिया.

आरोपितों ने पुलिस को जो बयान दिए उसके अनुसार विवाद तब बढ़ा जब अंकिता ने ये बात अपने कुछ दोस्तों को बताई कि उस पर ग्राहकों से संबंध बनाए का दबाव बनाया जा रहा है. आरोपितों को डर था कि अंकिता इस रिज़ॉर्ट में होने वाले कुकृत्यों की के बारे में सबको बता देगी. ऐसे में ये लोग अंकिता को लेकर रिज़ॉर्ट से निकले एक नहर के किनारे रूके.

पुलिस को दिए बयान में आरोपितों ने कहा है कि नहर के पास अंकिता और पुलकित का झगड़ा हुआ. इस दौरान अंकिता ने पुलकित का फ़ोन छीनकर नहर में फेंक दिया जिसके बाद पुलकित ने अंकिता को नहर में धक्का दे दिया.

अंकिता ने दो बार पानी से ऊपर आकर बचाने की गुहार भी लगाई लेकिन तीनों आरोपित वहां से भागकर रिजॉर्ट में आ गए. उन्होंने रिज़ॉर्ट के अन्य कर्मचारियों को बताया कि अंकिता अपने कमरे में ही है और कुछ देर बाद तीनों ने राजस्व पुलिस चौकी में जाकर गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करा दी.

चार दिनों तक अंकिता के परिजन अपनी बेटी की तलाश में भटकते रहे लेकिन राजस्व पुलिस की ओर से कोई कार्रवाई नहीं हुई. जब आक्रोशित जनता सड़कों पर उतर आई तब जाकर ये मामला पुलिस को सौंपा गया लेकिन तब तक इतनी देर हो चुकी थी कि अंकिता का शव चीला बैराज के पावर हाउस के पास नहर से बरामद हुआ. इस दौरान सरकार ने कार्रवाई के नाम पर पुलकित के रिज़ॉर्ट का कुछ हिस्सा बुलडोजर से ध्वस्त किया और उसके कुछ समय बाद गुस्साई जनता ने इस रिज़ॉर्ट में आग भी लगा दी. अंकिता के पोस्टमोर्टम के समय अस्पताल पहुंची स्थानीय विधायक रेणु बिष्ट को भी जनता के आक्रोश का शिकार होना पड़ा. गुस्साई भीड़ ने उनकी गाड़ी में भी तोड़ फोड़ की.

अंकिता हत्याकांड के इस मामले ने प्रदेश की पुलिस व्यवस्था पर भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं. दरअसल उत्तराखंड में लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा ऐसा है जहां न तो कोई पुलिस थाना है, न कोई पुलिस चौकी और न ही ये इलाका उत्तराखंड पुलिस के क्षेत्राधिकार में आता है. इन इलाक़ों में आज भी अंग्रेजों की बनाई वह व्यवस्था जारी है, जहां पुलिस का काम रेवेन्यू डिपार्टमेंट के कर्मचारी और अधिकारी ही करते हैं जिन्हें ‘राजस्व पुलिस’ कहा जाता है.

यानी प्रदेश के 60 प्रतिशत से ज़्यादा हिस्से की क़ानून व्यवस्था का ज़िम्मा उस पटवारी, लेखपाल या कानूनगो पर है जिसके पास न तो कोई संसाधन हैं और न ही कोई ट्रेनिंग. एक तरफ पहाड़ों में अपराधी अपराध के तमाम आधुनिक तरीक़ों में पारंगत हैं तो दूसरी तरफ उन्हें रोकने का ज़िमा उस पटवारी पर है जिसके पास अपराध की रोकथाम के लिए एक लाठी तक नहीं होती.

साल 2018 में उत्तराखंड हाई कोर्ट ने इस ‘राजस्व पुलिस’ की व्यवस्था को समाप्त करने के आदेश दिए थे. जस्टिस राजीव शर्मा और जस्टिस आलोक सिंह की खंडपीठ ने आदेश दिए थे कि छह महीने के भीतर पूरे प्रदेश से राजस्व पुलिस की व्यवस्था समाप्त की जाए और सभी इलाकों को प्रदेश पुलिस के क्षेत्राधिकार में शामिल किया जाए. लेकिन, इस आदेश के इतने साल बाद भी इस दिशा में कोई कार्रवाई नहीं हुई. अंकिता हत्याकांड के बाद राजस्व पुलिस का ये मामला एक बार फिर से चर्चाओं में है. विधान सभा अध्यक्ष ऋतु खंडूरी ने भी मुख्यमंत्री को एक पत्र लिखते हुए राजस्व पुलिस की व्यवस्था को समाप्त करते हुए पूरे प्रदेश में रेगुलर पुलिस की व्यवस्था करने का आग्रह किया है.

अंकिता की हत्या के आरोपित फ़िलहाल न्यायिक हिरासत में भेज दिए गए हैं और प्रदेश की तमाम जनता इन आरोपितों को सख़्त से सख़्त सजा देने की मांग कर रही है.