तिब्बत पर गढ़वाल की जीत का जश्न है ‘इगास’

इगास उत्तराखंड का एक लोक पर्व है. गढ़वाल क्षेत्र के कई गांवों में इसे दीवाली से भी ज़्यादा धूमधाम से मनाया जाता है.

दीवाली के 11 दिन बाद, यानी एकादशी के दिन ये त्योहार मनाया जाता है. इसमें कर्कश पटाखों का शोर नहीं जगमग भैले की रोशनियाँ होती हैं. सुरमाड़ी की बेल और चीड़ की लकड़ी से बने भैलों को नचाते हुए लोग गाते हैं ‘बारह ए गैनी बग्वानी – मेरो माधो नि आई, सोलह ऐनी श्राद्ध – मेरो माधो नी आई.’ ये लोक गीत, जो कहता है कि दीवाली बीत जाने के बाद भी मेरा माधो नहीं लौटा है, इसी में इगास बग्वाल के इतिहास की भी कहानी है. कहानी 17वीं सदी की जब गढ़वाल रियासत की कमान राजा महिपत शाह के हाथों में थी और तिब्बत उनका सबसे बड़ा दुश्मन होता था.

सी वैसल्स की किताब Early Jesuit Travellers in Central Asia में जिक्र मिलता है कि गढ़नरेश महिपत शाह ने तिब्बत पर तीन आक्रमण किए. इनकी कमान सम्भाली उनके सबसे वफ़ादार सेनापति माधो सिंह भंडारी ने. भौगोलिक परिस्थितियाँ गढ़वाल रियासत के अनुकूल नहीं थी. भारी बर्फ़बारी के चलते पहाड़ी दर्रों को पार करना बेहद कठिन होता था.

लिहाज़ा एक समय ऐसा आया जब तिब्बत और गढ़वाल रियासत के बीच शांति समझौता हो गया. लेकिन ये शांति भी ज्यादा दिन नहीं चली. समझौते के कुछ ही समय बाद महिपत शाह को जानकारी मिली कि तिब्बत सैनिकों ने वीर भड़ बर्थवाल बंधुओं की हत्या कर दी है. इस खबर से ग़ुस्साए गढ़नरेश ने तुरंत ही माधो सिंह भंडारी को तिब्बत पर आक्रमण का आदेश दिया.

माधो सिंह ने इस बार टिहरी, उत्तरकाशी, जौनसार और श्रीनगर समेत कई अन्य क्षेत्रों से योद्धाओं को बुलाकर एक सेना तैयार की और तिब्बत पर हमला बोल दिया. भीषण युद्ध के बाद आख़िरकार जीत गढ़ राज्य के सिपाहियों की हुई. उन्होंने तिब्बत की सीमा पर अपनी मुनारें गाड़ दी जो आज तक वहीं मौजूद हैं.

इससे जुड़ी एक दिलचस्प जानकारी ये भी है कि आगे चलकर जब 20वीं सदी की शुरुआत में अंग्रेजों ने तिब्बत से भारत की सीमा निर्धारित की तो इन्हीं मुनारों को मैक मोहन लाइन माना गया. योद्धा माधो सिंह भंडारी और उनके सैनिकों ने तिब्बत नरेश को हरा तो दिया, लेकिन इसकी सूचना गढ़वाल रियासत की राजधानी श्रीनगर तक नहीं पहुंच पाई. राजा महिपत शाह ने जब माधो सिंह भंडारी को इस युद्ध के लिए रवाना किया था तो उन्हें ये भी आदेश दिया था कि वे हर हाल में दीवाली से एक दिन पहले तक श्रीनगर लौट आएँ.

लेकिन दीवाली आने पर भी जब माधो सिंह भंडारी और उनके सैनिक नहीं लौटे तो पूरे राज्य में शोक का माहौल बन गया. कई तरह की अफवाहें फैलने लगी. किसी ने कहा कि पूरी सेना बर्फीले दर्रे में दफन हो गई है तो किसी ने ये कहा कि तिब्बत से युद्ध में सारे गढ़वाली सैनिक मारे गए हैं.

राजा महिपत शाह ने एलान करवा दिया कि इस बार राज्य में दीवाली नहीं मनाई जायेगी. ये शोक चार दिनों तक रहा और तब जाकर टूटा जब राजा का एक खबरी भागते हुए राज महल में दाखिल हुआ और उसने राजा को बताया कि माधो सिंह भंडारी विजय सेना के साथ लौट रहे हैं. अफ़वाहों से फैला शोक अब जश्न में बदल गया.

राजा ने ढोल-नरसिंहा बजवाकर इस जीत की घोषणा करवाई. चारों दिशायें वीर योद्धा माधो सिंह भंडारी के जय कारों से गूंज उठी. राजा ने ऐलान करवाया कि अब जिस भी दिन सेना श्रीनगर में प्रवेश करेगी, उसी दिन दीवाली मनाई जायेगी. माधो सिंह भंडारी की सेना दीवाली के ठीक 11 दिन बाद यानी एकादशी के दिन श्रीनगर पहुंची. उस दिन पूरे धूम-धाम से गढ़वाल रियासत में दीवाली मनाई गई और यहीं से इगास बग्वाल की शुरुआत भी हुई जो आज तक गढ़वाल में मनाई जाती है.

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