‘भरतु दाई’, उत्तराखंड का पहला गैंगस्टर

आपने बिहार और झारखंड के खूनी गैंग-वार पर बनी फिल्म गैंग ऑफ वासेपुर देखी होगी. आपने बॉम्बे के अंडरवर्ल्ड के वो हिंसक किस्से सुने होंगे, जिन्हें सुनकर इस माया नगरी से प्यार नहीं, बल्कि डर लगने लगता था. आपने पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के कुख्यात हिस्ट्रीशीटर्स और गैंगस्टर्स की आपसी खूनी अदावतों की खबरें भी खूब पढ़ी होंगी. और सत्तर के दशक में आई हॉलीवुड की ब्लॉकबस्टर फिल्म गॉडफ़ादर के मुख्य किरदार कॉरलियॉनी को न्यू यॉर्क की गलियों में कोहराम मचाते भी देखा होगा.

लेकिन क्या आप जानते हैं कि उसी दौर में जब देश-दुनिया के ये कुख्यात डॉन रिवाल्वर, बंदूक और खुखरियों से आतंक की सत्ता कायम किये हुए थे, तभी शांत-से दिखने वाले शहर देहरादून में मशीन गन और हैंड-ग्रेनेड लिए एक कुख्यात पहाड़ी गैंगस्टर ने आतंक काटा हुआ था. अपने कारनामों के चलते इस गैंगस्टर की न केवल देहरादून शहर में तूती बोलने लगी थी, बल्कि पश्चिम उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा और मुंबई के बड़े-बड़े माफिया भी इस पहाड़ी बाहुबली का इस्तकबाल जरायम की दुनिया में कर रहे थे. उसने न केवल एक-एक कर अपने सभी दुश्मनों को ठिकाने लगा दिया था बल्कि देहरादून में रंगदारी, अपहरण और हत्याओं की पहली पहल पटकथाएँ भी लिखी.

ये कहानी शुरू होती है उस दौर से जब देश को आज़ाद हुए महज़ एक दशक ही बीता था. बँटवारे का दंश झेल रहे लाखों परिवार अपनी बिखर चुकी ज़िंदगी को समेटने में खपे जा रहे थे. ऐसे ही कुछ परिवारों को देहरादून के प्रेमनगर और रेसकोर्स में भी बसाया गया. आमदनी के साधन सीमित थे तो इनकी अगली पीढ़ी के कई युवा जुर्म की दुनिया में आमद कराते चले गये. सट्टेबाज़ी, कच्ची शराब का धंधा, अवैध खनन, फिल्मों के टिकट ब्लैक करना, स्क्रैप की नीलामी उठाना और साइकल स्टैंड के ठेके हथियाने जैसे धंधे यहां के बेरोजगार नौजवानों की पहली पसंद बन रहे थे.

इन लड़कों ने जब अवैध धंधों से मिलने वाले पैसे का स्वाद चखा तो इनके कई गैंग पनपने लगे. ये लोग शहर में खुले आम रंगदारी, अपहरण और डकैती जैसी घटनाओं को अंजाम देने लगे. पूरे शहर में इनका आतंक फैलने लगा और संगठित अपराधों से दून के हर इलाके में खौफ पसरने लगा था. कहा जाता है कि इन गैंग्स का सबसे बड़ा शिकार गढ़वाल के पहाड़ी इलाकों से दून में आकर बसे पर्वतीय मूल के लोग हो रहे थे. इनका आतंक इतना गहरा था कि लूट हो जाने के बाद भी न तो कोई पुलिस रिपोर्ट दर्ज होती और न कोई उनके खिलाफ गवाही देने की हिम्मत करता.

इसी अफ़रा-तफ़री, आतंक और डर के बीच डीएवी इंटर कॉलेज में एक छात्र अपनी 12 वीं की बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी में जुटा था. उसके पिता मातबर सिंह एक काश्तकार थे जो कुछ साल पहले ही टिहरी जिले के दिखोल गांव से अपना पूरा परिवार लेकर, देहरादून के पूर्वी छोर पर बालावाला में आ बसे थे. ये लड़का मातबर सिंह के तीन बेटों में सबसे बड़ा था और 12वीं के बाद फौज में भर्ती होने का सपना देख रहा था. लेकिन नियति को ये मंजूर नहीं था. क्लास में हुई एक मामूली कहा-सुनी ने इस लड़के के सारे सपने तोड़ दिए और इसे अपराध की दुनिया के ऐसे वन-वे पर चलने को मजबूर कर दिया जहां फिर कोई यू-टर्न नहीं था.

हुआ हूँ कि इस लड़के की एक क्लासमेट को कोई मनचला लगातार परेशान कर रहा था. लड़की पहाड़ी थी और उसे तंग करने वाला प्रेमनगर के बदमाशों का करीबी समझा जाता था. लड़की की परेशानी देख पहाड़ी मूल के छात्रों में गुस्सा तो था लेकिन कोई भी इस मनचले से टकराने की हिम्मत नहीं कर रहा था. इस लड़के ने वो हिम्मत दिखाई और मनचले से दो टूक कह दिया कि वो इस लड़की को आज के बाद तंग न करे. ये झड़प हाथापाई में बदल गई और अगले ही दिन वो मनचला प्रेमनगर के अपने कुख्यात बदमाश साथियों को बुला लाया.

लाठी-डंडे लिए ये बदमाश जब स्कूल के बाहर पहुँचे तो ये लड़का इन्हें देख कर भागा नहीं, बल्कि अपनी बेल्ट लहराता हुआ इन बदमाशों पर झपट पड़ा. दो लड़कों को उसने अपनी बाहों के बीच दबाया और फिर इतने जोर से नीचे पटका कि एक का सिर और दूसरे का जबड़ा टूट गया. जमीन पर खून बिखरा देख बाक़ी सभी बदमाश भाग गए. ये पहली बार हुआ था जब किसी पहाड़ी लड़के ने प्रेमनगर के कुख्यात बदमाशों से टकराने की हिम्मत की थी. लड़ाई के बाद स्कूल के तमाम पहाड़ी लड़कों ने उसे अपने कंधों पर बैठा लिया और उसकी जय जयकार करने लगे.

यही वो दिन था जब भरत सिंह नेगी नाम के इस लड़के को पहली बार भरतू दाई कहा गया; यही वो दिन था जहां से भरतू की आमद अब किसी फौजी बैरक के हाज़िरी रजिस्टर के बजाए, पुलिस के क्राइम रिकॉर्ड में दर्ज होने वाली थी और यही वो दिन था, जब देहरादून के एक भावी कुख्यात गैंगस्टर ने जन्म ले लिया था. उसने प्रेमनगर के उन कुख्यात बदमाशों से दुश्मनी मोल ले ली थी जिनसे पूरा शहर ख़ौफ़ खाता था. ये दुश्मनी फिर बढ़ती गई, भरतू भी इससे पार के लिए और हिंसक होता गया और उसका नाम देहरादून के अलग-अलग थानों में अपराध-दर-अपराध दर्ज होता चला गया.

भरतू भले ही पुलिस के क्राइम रिकॉर्ड में बतौर गैंगस्टर दर्ज हो रहा था लेकिन आम लोगों के बीच उसकी रॉबिनहुड जैसी छवि बन रही थी. गरीब, बेसहारा और शोषित लोगों की मदद करने के उसके कई क़िस्से चर्चित होने लगे थे.

भरतू के दोस्त रहे दिनेश थापा के हवाले से पत्रकार मुकेश पंवार एक लेख में बताते हैं, ‘एक दिन भरतू रोडवेज की बस से डोईवाला से बालावाला लौट रहा था. उस बस में पहाड़ से आया एक यात्री अपनी बकरी संग यात्रा कर रहा था. कंडक्टर ने यात्री से बकरी का अतिरिक्त किराया मांगा. गरीब यात्री के पास बकरी का किराया चुकाने के पैसे नहीं थे. इस पर कंडक्टर ने उसकी बकरी को ही अपने कब्जे में ले लिया और यात्री को धक्का देकर बस से उतारने लगा. भरतू को ये बर्दाश्त नहीं हुआ. उसने कंडक्टर का विरोध किया तो बात बढ़ते-बढ़ते मारपीट तक उतर आई. कंडक्टर के कई साथी और पुलिस भी मौके पर पहुंच गई लेकिन भरतू का ग़ुस्सा अब तक आपे से बाहर हो चुका था. वो अकेला इन सब से लड़ा, उस कंडक्टर को भरतू ने पीट-पीटकर लगभग अधमरा कर दिया और साथ ही एक पुलिस कॉन्स्टेबल के पेट में पेचकस मार कर भरतू वहां से फरार हो गया.

भरतू के ऐसे झगड़े आम आम होने लगे थे लेकिन जुर्म की दुनिया में उसका नाम अभी पक्के तौर से लिखा जाना बाकी था. ये दिन तब आया जब भरतू ने अपने एक दोस्त के साथ मिलकर घनसाली का बैंक को लूटने की साजिश रची. इस लूट के दौरान भरतू और उसका साथी बैंक के एकाउंटेंट एमएल सुंदरियाल को गोली मार कर फ़रार हो गए. लेकिन बैंक लूट की सूचना जैसे ही पुलिस संचार तंत्र में फैली तो पूरे पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया. पुलिस ने इन दोनों को पोखाल में दबोच लिया और गिरफ्तार कर जेल भेज दिया.

इस घटना के बाद भरतू अब शातिर अपराधियों में गिना जाने लगा. कुछ महीनों बाद जब वो जमानत पर बाहर आया तो उसका नाम रायपुर, नत्थू वाला, बालावाला, नकरौंदा, नेहरू ग्राम, हर्रावाला, डोईवाला, थानो और भोगपुर तक में फैल चुका था. वो पहाड़ी मूल के लोगों के लिए एक कल्ट बन चुका था. सिर्फ़ पहाड़ी युवा लड़के ही नहीं बल्कि पर्वतीय मूल के तमाम सरकारी कर्मचारी, किसान और व्यापारी भी उसे हीरो की तरह देखने लगे थे. इन लोगों को लगने लगा था कि आखिरकार प्रेमनगर के बदमाशों की दादागिरी से उन्हें बचाने वाला कोई आ गया है. बताते हैं कि जेल से लौटने के तुरंत बाद ही भरतू ने अपनी खुद की गैंग बना ली थी जिसमें सौ से ज्यादा गढ़वाली और नेपाली लड़के शामिल हुए.

भरतू का नाम जिस तेज़ी से फैल रहा था, उसकी दुश्मनी भी उसी तेजी से बढ़ती जा रही थी. उसके दुश्मनों में सबसे बड़े नाम थे हंसा और लच्छा. ये दोनों ही उस दौर में प्रेमनगर के सबसे बड़े गैंग के सरग़ना हुआ करते थे. सट्टेबाज़ी, सरकारी ठेके, रंगदारी और अवैध खनन जैसे धंधों पर अब तक इनका एकछत्र राज हुआ करता था लेकिन अब भरतू ने इन धंधों में सेंध-मारी शुरू कर दी थी.

हंसा और लच्छा की आँखों में भरतू लगातार खटक रहा था. उन्होंने अपने कई गुर्गे भरतू के पीछे लगा दिए थे. लेकिन भरतू इनसे एक कदम आगे था. उसने पूरे शहर में अपने मुखबिरों का ऐसा जाल फैला लिया था कि उसे हंसा और लच्छा के हर मंसूबे की जानकारी पहले ही मिल जाया करती. इन्हीं मुखबिरों से उसे ये भी पता चला कि 21 दिसंबर की रात को उसकी हत्या की योजना बनाई गई है. स्कूल में हुई अपनी पहली लड़ाई से ही उसने सीख लिया था कि ‘attack is the best defence’ इस बार भी उसने यही रणनीति अपनाते हुए ऐसा कदम उठाया जिसने उसे शहर के दाई से एक कुख्यात गैंगस्टर बना दिया.

भरतू को एक लीड मिली कि शाम के वक्त हंसा अपने स्कूटर पर डोईवाला से लौटेगा और जोगीवाला चौक को क्रॉस करेगा. उसने तुरंत ही अपने एक परिचित से प्वाइंट 32 बोर की रिवाल्वर ली और शाम होने से पहले ही जोगीवाला चौक पहुंच कर एक चाय की एक दुकान में हंसा का इंतज़ार करने लगा. तय समय पर जैसे ही हंसा वहां से गुजरा, भरतू ने बीच सड़क पर उसके स्कूटर के सामने आकर महज पांच मीटर की दूरी से पांच फायर हंसा के शरीर में झोंक दिए. हंसा जमीन पर लहूलुहान होकर गिर पड़ा. देहरादून के इस पहले शूट-आउट से पूरे क्षेत्र में सनसनी फैल गई.

पाँच गोलियां खाने के बाद भी हंसा बच तो गया, लेकिन वो इतनी दहशत में आ गया कि उसने बदमाशी से तौबा कर ली. ठीक ऐसा ही लाच्छा दाई ने भी किया. इन दोनों के गैंग ही खत्म हो गए. पुराने लोग बताते है कि हंसा ने बाद में प्रेमनगर में ही चाय की दुकान खोल ली थी और 2018 में उसकी मौत हुई. बहरहाल, इस शूटआउट के बाद भरतू का देहरादून के सभी अवैध धंधों पर वर्चस्व हो गया.

भरतू ने पहाड़ियों के बीच क्षेत्रवाद की भावना को जमकर भुनाया. उससे ये हुआ कि पूरा देहरादून दो हिस्सों में बंट गया. नेपाली और गढ़वाली एक तरफ हो गए जबकि प्रेमनगर, गढ़ी कैंट और सदर देहरादून के पंजाबी मूल के लोग दूसरी तरफ़. ये ध्रुवीकरण इतना ज़बरदस्त था कि पुलिस प्रशासन में पहाड़ी मूल के अधिकारी और कर्मचारी भी भरतू के काले कारनामों पर आंख मूंदने लगे. इससे भरतू दिन प्रतिदिन और ताकतवर होता चला गया.

देहरादून और इसके आस-पास के इलाकों में उस दौरान में जितने भी छोटे-बड़े दाई थे, वो सभी तेजी से भरतू के गैंग में शामिल होने लगे. इनमें पहला नाम था प्रेमनगर के जनक दाई का. जनक जब भरतू के गैंग में शामिल हुआ तो गांधी पार्क के पास ही उसके चाचा की चाय की दुकान भरतू गैंग का नया अड्डा बन गई.

इस गैंग में शामिल होने वाला दूसरा बड़ा नाम था बारू. सेना से रिटायर हुए बारू ने नेहरू ग्राम के इलाके में बेहद तेजी से अपनी पैठ बना ली थी. वो गोर्खाली मूल का था और उसके गैंग में भी ज्यादातर नेपाली मूल के ही लड़के थे. बारू के पास हेंड ग्रेनेड समेत कई हथियार मौजूद थे. उसके शामिल हो जाने से भरतू गैंग अब बहुत ज़्यादा ताकतवर हो चुका था. इस समय तक भरतू के बाएँ हाथ के रूप में भानियावाला के आनंद का भी उदय हो चुका था. जमींदार परिवार से ताल्लुक रखने वाला आनंद ही भरतू गैंग के धंधों का सारा हिसाब-किताब रखा करता था. भरतू, जनक, बारू और आनंद मिलकर पूरे देहरादून पर राज करने लगे थे.

लेकिन, इन चारों का ये साथ ज्यादा दिनों तक नहीं चल सका. बारू बेहद महत्वाकांक्षी भी था और बेहद ग़ुस्सैल भी. उसका ग़ुस्सा उसकी ताक़त भी थी और उसकी कमजोरी भी. इसी गुस्से के चलते कई बार भरतू के कहने पर भी वो हद से आगे बढ़ जाता था. इसी गुस्से के चलते एक दिन लेन-देन के हिसाब में उसका जनक से झगड़ा हो गया. दोनों के बीच जमकर मारपीट हुई और आखिरकार भरतू के बीच-बचाव करने से मामला शांत हुआ. उस दिन ये मामला तो शांत हो गया, लेकिन बारू का गुस्सा फिर भी शांत नहीं हुआ था.

ये ग़ुस्सा कुछ दिनों बाद फूटा और ऐसा फूटा कि सारा शहर सन्न रह गया.

जगह थी न्यू एंपायर सिनेमा हॉल.

फिल्म चल रही थी ‘चंदा और सूरज.’

दिन के साढ़े 12 बजे थे जब जनक अपने दो साथियों के साथ फिल्म देखकर पिक्चर हॉल से बाहर निकला. बारू ने थिएटर के ठीक सामने ही उस पर पांच गोली दाग दी. जनक की मौके पर ही मौत हो गई. दिनदहाड़े शहर के बीचों-बीच हुए इस हत्याकांड से पूरे शहर में सनसनी फैल गई. पुलिस ने बारू के संभावित ठिकानों पर दबिश दी और अगले ही दिन उसे गिरफ्तार कर लिया गया. लेकिन उधर, भरतू ने इसे बारू की ओर से एक खुली चुनौती माना और इसके साथ ही एक भयानक खूनी संघर्ष की शुरुआत हो गई.

भरतू ने अपने मुखबिरों की बदौलत बारू के कई साथियों को गोलियों से भून डाला तो बारू ने भी भरतू के कई लोगों को मार गिराया. एक बार फिर से पूरा शहर दो हिस्सों में बंट गया.

लेकिन अब तक भरतू देहरादून की एक बड़ी आबादी में रोबिनहुड के नाम से विख्यात हो चुका था. वो भले ही पुलिस की नजरों में अपराधी था, लेकिन उसके रोबिनहुड के किस्से अब तक चारों तरफ फैलने लगे थे. इसके चलते उसे हजारों लोगों का समर्थन हासिल था. ऐसा समर्थन कि उसकी एक आवाज पर लोग आंख मूंद कर कुछ भी करने के लिये तैयार हो जाते थे. कहते हैं कि अगर किसी गरीब पहाड़ी परिवार में बेटी की शादी हो तो भरतू वहां आर्थिक मदद जरूर दे आता था. किसी को इलाज के लिए पैसे चाहिए होते तो वो भरतू के पास आता. न जाने कितने बुजुर्ग लोगों की भरतू ने मदद की. उसे पहाड़ी जनता का बड़ा समर्थन मिलता था और इसका फायदा वो अपने दुश्मनों को रास्ते से हटाने में भी ले रहा था.

भरतू के पास अब तक नाइन एमएम की कारबाइन स्टेनगन भी आ चुकी थी. इससे भरतू का कद भी बहुत बढ़ गया था और उसका दुस्साहस भी. इसी दुस्साहस में भरतू ने एक बड़े हत्याकांड को अंजाम दिया. ऐसा हत्याकांड जिसकी गूंज उस वक्त दिल्ली के सफेदपोशों से लेकर मुंबई के अंडरवर्ल्ड तक पहुंच गई.

हुआ यूं कि भरतू किसी भी तरह बारू को मारने की फिराक में था. एक रोज़ उसके मुखबिरों ने उसे बताया कि बारू अपनी बुलेट पर सवार होकर जोगीवाला की तरफ आ रहा है. बारू की पहचान बन चुकी काली चमड़े की जैकेट और बुलेट मोटरसाइकिल को सामने से आता देख भरतू ने अपनी मशीनगन की पूरी मैगजीन उस बाइक सवार के सीने में उतार दी. लेकिन बाद में मालूम चला कि वो बारू नहीं बल्कि उसकी ही गैंग में काम करने वाला विजयंत था. विजयंत की वहीं मौत हो गई लेकिन इससे अब बारू बेहद सतर्क हो गया.

उधर, दिनदहाड़े मशीनगन से हुए इस हत्याकांड से क़ानून व्यवस्था पर कई सवाल खड़े कर दिए थे. पुलिस पर भारी दबाव आने लगा लिहाजा पुलिस ने दोनों ही गैंग के सदस्यों का सीधा एनकाउंटर करना शुरू किया. भरतू के गैंग में शामिल जेबकतरों का सरदार काड़ू, विजय उर्फ गोजू और भरतू के बेहद ख़ास आनंद को ऐसे ही एक एनकाउंटर में पुलिस अधिकारी नरेंद्र सिंह और उनकी टीम ने मार गिराया. यही वो दौर भी था जब में इमरजेंसी लगी थी. भरतू को पुलिस ने मीसा यानी Maintenance of Internal Security Act के तहत गिरफ्तार कर जेल भेज दिया.

अपने कुछ बेहद ख़ास साथियों के मारे जाने से भरतू बेचैन था और जेल से बाहर आने को छटपटा रहा था. तभी एक ऐसी घटना हुई, जिसके चलते वो पुलिस की गुड बुक में आ गया. हुआ ये था कि मुजफरनगर में एक बड़ी बैंक लूट हो गई. ये बैंक लूट आठ लाख रूपये की थी और सत्तर के दशक में ये देश की बड़ी बैंक लूट में से एक थी. इसे इतने शातिराना तरीके से अंजाम दिया गया था कि पुलिस के हाथ काफी समय तक खाली रहे.

उस समय देहरादून कोतवाली में इंस्पेक्टर महावीर त्यागी थे. उन्हें इस बात का इल्म था कि भरतू के पश्चिम यूपी के बड़े कुख्यात बदमाशों से संबंध हैं. लिहाज़ा वो जेल में भरतू के पास गए और उससे मदद करने को कहा. भरतू ने इसे एक मौके की तरह लिया और जो जानकारी पुलिस इंस्पेक्टर को दी, उससे उनके ही पैरों तले जमीन खिसक गई.

भरतू ने बताया कि ये लूट विक्रम और धर्मपाल नाम के दो जाटों ने उसकी ही मशीनगन का इस्तेमाल करते हुए की है. उसने ये भी बताया कि वो दोनों अब चंडीगढ़ में छुपे हुए हैं. भरतू की मदद से पुलिस ने दोनों को दबोच लिया. लेकिन इस ऑपरेशन में इंस्पेक्टर महावीर त्यागी की मौत हो गई. आगे चलकर विक्रम और धर्मपाल नाम के इन बदमाशों को फांसी की सजा हुई.

बहरहाल ये गिरफ़्तारी पुलिस की बड़ी जीत थी और इसमें भरतू ने अहम किरदार निभाया था. लिहाज़ा उसे पुलिस से परोक्ष समर्थन मिलना और भी बढ़ गया था. लेकिन अब तक बारू से उसकी दुश्मनी बेहद बढ़ चुकी थी और बारू भी अब कोई छोटा-मोटा गैंगस्टर नहीं रह गया था. उसके गैंग में भी मशीनगन से लेकर वो तमाम हथियार आ चुके थे जो भरतू की गैंग के पास हुआ करते थे. इससे दून घाटी में खूनी तांडव इतना बड़ गया कि लोग शाम को घर से निकलने में भी डरने लगे थे.

आए दिन हत्या होना आम बात हो गई थी. रायपुर में भरतू गैंग का कुंदन मारा गया तो बदले में भरतू ने बारू के साले तेजू और उसके साथी रामअवतार को प्रिंस चौक के पास मार गिराया. इसी दौरान पुलिस ने बारू के एक खास आदमी को अपनी तरफ मिला लिया और एक दिन उसी खास आदमी ने बारू की शराब में जहर मिलाकर उसकी हत्या कर दी. कहा जाता है कि इस पूरी साजिश में भरतू का भी अहम किरदार था.

भरतू का सबसे बड़ा दुश्मन अब मार चुका था. हालाँकि बारू की मौत के बाद उसका गैंग शशि और रेशम थापा संभाल रहे थे लेकिन भरतू इन्हें अपना लिए कोई खतरा नहीं मानता था. उसका यही अति का आत्मविश्वास उसकी मौत का कारण भी बना.

तारीख थी 14 नवंबर 1978. बालावाला में एक नाटक समारोह आयोजित होने वाला था. भरतू को ऐसे समारोह बेहद पसंद थे. भरतू इसकी तैयारी में जमकर लगा हुआ था और इसी सिलसिले में वो अपने साथी राजेंद्र सिंह के साथ नाटक के निमंत्रण पत्र छपवाने एस्ले-हॉल की एक प्रिंटिंग प्रेस अपनी मोटरसाइकिल से जा रहा था. रास्ते में भरतू अपने एक परिचित के पास रुका और उसे बताया कि उसकी मशीनगन का बर्स्ट फायर तीन गोली दागने के बाद अटक रहा है. उसने अपनी मशीनगन मरम्मत के लिए इस परिचित के पास ही छोड़ दी और अपनी बुलेट से एस्ले-हॉल की तरफ निकल गया. परिचित ने उसे चेताया भी वो बिना हथियार के ऐसे खुलेआम शहर न जाए. भरतू ने जवाब दिया, ‘अब कौन बचा है जो मेरी जान ले सके.’

लापरवाही में कहा गया वाक्य भरतू के जीवन का अंतिम वाक्य साबित हुआ. रेशम, शशि और उनके तीसरे साथी मजनू को जब ये सूचना मिली कि भरतू बिना हथियार के निकला है तो जैसे उनकी मुराद पूरी हो गई. मजनू के पास ऑटो था. तीनों हथियारों से लैस होकर ऑटो में बैठे और भरतू के पीछे निकल गए.

उस दिन भरतू के साथ रहे राजेंद्र सिंह बताते हैं, ‘ एक ऑटो आया और हमारी बाइक के बगल में चलने लगा. उस पर पर्दे लगे हुए थे. फिर एक पर्दा हटा और मशीनगन से जबरदस्त बर्स्ट फायर हुआ. एक गोली मेरे जबड़े में लगी जबकि तीन सीने में. मैं बेहोश हो गया. तकरीबन दस गोली भरतू को लगी और उसकी वहीं मौत हो गई. मैं किसी तरह बच गया और लंबे समय अस्पताल में रहे के बाद ठीक हुआ.’

बताते हैं कि जिस दिन भरतू मारा गया उस दिन बालावाला समेत कई गांवों में लोगों ने दुख में चूल्हा नहीं जलाया था.

भरतू की मौत के साथ ही देहरादून में संगठित अपराधों के शुरुआती अध्याय का भी अंत हो गया. लेकिन, उसकी दादागिरी के किस्से और रॉबिनहुड सरीखी कहानियां दशकों तक देहरादून में सुनाई जाती रही. बालावाला में उसके नाम से एक चौक आज भी मौजूद है.

भरतू की हत्या के बाद रेशम और उसके दोनों साथियों का वर्चस्व भी दून में ज्यादा दिन न रह सका. क्योंकि जल्द ही दून घाटी में एक नए दाई का उदय हुआ जिसने घाटी में अपराधों में दूसरा अध्याय शुरू किया. रेशम थापा और शशि की हत्या करके अपना वर्चस्व जमाने वाले इस नए कुख्यात का नाम था निक्कू.


निक्कू की कहानी हम आपको अगले कुख्यात के अगले एपिसोड में सुनाएंगे. जुड़े रहें, बारामासा

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