उत्तराखंड के लोकगीतों में गूंजती है घुघुति

  • 2023
  • 27:20

किंगर का झाला घुघुती, पांगर का डाला घुघुती
ले घुर घुरानी घुघुती, ले फुर उड़ानी घुघुती
ले टक लगानी घुघुती, के रेंदी बिगांदी घुघुती
के देश की होली घुघुती, के देश बे आई घुघुती।।

उत्तराखंड के युवा लोक गायक किशन महिपाल जब पूरे मनोयोग के साथ इस गीत को गाते हैं तो हमारे सामने एक ऐसी घुघुती का चित्र उभर कर आ जाता है, जो हर समय हिमालयी जनजीवन में घुली-मिली है. सबसे बात करती हुई, सबको पहचानती हुई. यह घुघुती हमेशा हिमालयी लोगों के आस-पास रहती है. उनके दुख-सुख में, वेदना में-चेतना में, सबको खुद लगाती, सबकी नराई फिड़ाती. हिमालय की आवाज बनकर, हिमालय के मर्म से जुड़कर.

घुघुती का गहरा नाता है पहाड़ी लोकजीवन के साथ – हिमालय-सी शुभ्रता और गंभीरता लिए, गंगा की निर्मलता और प्रवाह लिए. घुघुती पहाड़ी जीवन का ऐसा सुंदर बिंब है जिसके बिना हिमालयी जनजीवन को समझना कठिन है. सांस्कृतिक समृद्धता, लोक पंरपरा, लोकगीत-लोकगाथाओं, ऐतिहासिक संदर्भों, साहित्य, संगीत, कला में घुघुती अपने आप उपस्थित हो जाती है. घुघुती जितनी खूबसूरत है उतनी ही संवेदनशील भी. बहुत सारे लोक आख्यानों से लेकर लोकगीतों में घुघुती गहरे तक समाई है. घुघुती मनोभावों को न केवल अभिव्यक्त करती है, बल्कि लोक की उस पीड़ा को भी सामूहिक स्वर देती है, जिसमें बहुत दूर अपने प्रियजनों तक पहुंचने का सामर्थ्य है. यही वजह है कि जब भी किसी को अपने प्रियजन की खुद लगती है या उसे संदेश देना हो तो खुदेड़ या न्यौली गीतों में घुघुती ही माध्यम बनती है.

एक तरह से घुघुती हिमालयी जीवन के खुदेड़ गीतों की नायिका है. प्रेम में डूबी किसी प्रेमिका से लेकर, अपने मायके को याद कर रही ध्यांणियों तक, घुघुती सबकी संदेशवाहक होती है. बण में अकेली विरह में डूबी पत्नी जब दूर परदेश गए पति को याद करती है तो उसके लिए घुघुती ही सबसे भरोसेमंद वाहक होती है जो उसके मर्म को उसी रूप में पति के पास पहुंचा सके. मायके की खुद में अपने मां-भाई की सलामती और रैबार लाने के लिए घुघुती से विश्वस्त साथी और नहीं हो सकता. चैत्र मास में कूंकने वाली घुघुती के बोल मायके वालों को अपनी बेटी को भिटौली दिलाने की याद दिलाते हैं.

दरअसल, घुघुती का पहाड़ी जीवन से बहुत शुरुआत से ही नाता रहा है. लोकगीतों की परंपरा रही है कि वो अपने कथ्य, बिंब, प्रतीक और नायक अपने ही परिवेश से उठाते हैं. वही उसे जीवंत भी बनाते हैं. घुघुती पहाड़ के लोकगीतों का ऐसा बिंब है जिसके बिना उसकी जीवंतता को समझा ही नहीं जा सकता. कभी जब संचार के साधन इतने नहीं थे, तो लोगों की पहुंच भी सीमित थी. विषम और कठिन भौगोलिक परिस्थिति में रहने वाली बड़ी आबादी ने अपने लिए प्रकृति से ही अपने मुताबिक प्रतीक भी चुन लिए. स्वाभाविक रूप से कृषि, पशुपालन और वन उपज आधारित अर्थव्यवस्था वाले समाजों ने प्रकृति के पशु-पक्षियों और पेड़ों तक से बातचीत करनी शुरू कर दी. कई लोक कथाओं में इस बात का जिक्र आता है कि मनुष्य पशु-पक्षियों की भाषा भी समझते थे. कई कहानियों में तो इसी आपसी समझ ने एक-दूसरे की सहायता भी की है. हमेशा से श्रम-शील रही पहाड़ी महिला के सबसे ज्यादा साथ रहने वाला पक्षी घुघुती ही है. हो सकता है महिलाएं भी घुघुती की भाषा को समझने लगी हों. और घुघुती भी उनके मर्म को उसी तरह समझती हो, जैसे वह अपने प्रियजन को पहुंचाना चाहती हों. जो भी हो, प्रकृति का साथ मनुष्य के अन्तर्सबंधों की इस प्रकृति प्रदत्त भावना ने एक ऐसा लोक चरित्र गढ़ा जो कई रूपों में हमारे सामने दिखाई देता है.

हालांकि घुघुती को लेकर लोकगीतों की पुरानी परंपरा रही है, लेकिन जब कुमाऊं के सुप्रसिद्ध गायक गोपाल बाबू गोस्वामी ने ‘आमै की डाई मा घुघुती न बासा…’ गीत गाया तो उनकी कर्णप्रिय आवाज और नए संगीत ने इस गीत को देश-दुनिया में बहुत लोकप्रिय बना दिया. बहुत कम लोगों को पता है कि इस गीत के रचनाकार कुमाऊं के सुप्रसिद्ध गीतकार-कवि-गायक गोपाल दत्त भट्ट हैं. अस्सी के दशक में जब कैसेट का नया दौर आया तो इस गीत ने लोकप्रियता की ऊंचाइयों को छुआ. घर-घर बजने वाले इस गीत ने गोस्वामी जी की आवाज में न केवल अपनी खुद-नराई को मिटाया, बल्कि इस गीत में प्रेम-विछोह, नराई, उम्मीदें और अपने ईष्ट को याद करते हुए एक ऐसा वातावरण बनाया जो लोक के कई रूपों का प्रकटीकरण था-

म्यर मैती की भगवती, तू दैंणा है जाये/कुशल मंगल म्यरा स्वामी घर ल्याये/नंगार-निशाणा ल्यूलों हो देवी मैं त्यारा थान मा..

इसी दौर में गढ़रत्न नरेन्द्र सिंह नेगी ने एक गीत गाया- ‘घुघुती घुरयोंण लैगी मेरा मैत की…..’ इस गीत को उत्तराखंड के सर्वाधिक सुने जाने वाले गीतों में शामिल किया जा सकता है. इस गीत में जहां गढ़वाल के गांवों में रहने वाली ध्यांणियों की व्यथा थी, वहीं इसमें जिस तरह के बिंब, गहरी संवेदना और शब्द चयन था, उसने कई पीढ़ियों को गढ़वाल के जनजीवन से जोड़ा. एक तरह से ये तीन-चार पीढ़ियों का प्रतिनिधि गीत भी बना. एक वो पीढ़ी जिसने गांव में रहकर इस तरह का जीवन जिया, दूसरी वो पीढ़ी जो गांव छोड़कर अब शहरों में रह रही है और तीसरी पीढ़ी वो जो अपने गांव के उस अतीत को समझना चाहती है जहां इस तरह की गहरी लोकस्पर्शी स्वरों को जन्म देने की उर्वरा है. इसीलिए नरेन्द्र सिंह नेगी का ये गीत आज भी उसी तरह लोकप्रिय है और भविष्य में भी रहेगा, जिसके बोल हैं:

घुघती घुर्योंण लैगी मेरा मैत की…

इससे पहले आकाशवाणी के ‘उत्तरायण’ और ‘गिरि गुंजन’ कार्यक्रम में बहुत सारे खुदेड़ गीतों में घुघुती का जिक्र आता रहा है. सत्तर के दशक में एक गीत बहुत लोकप्रिय हुआ था-

‘ना बासा घुघुती चैत की, खुद लागींच मां मैत की…

एक और सुन्दर गीत आकाशवाणी से प्रसारित होता था- ‘प्यारी घुघुती जैली, मेरी मांजी से पूछि ऐली…’

इस तरह घुघुती पर आधारित बहुत सारे गीत समय-समय पर गाये जाते रहे हैं. इसके अलावा बहुत पुराने लोकगीत भी हैं जो भले ही कहीं रिकार्ड न हुए हों या आकशवाणी और दूरदर्शन जैसे मंचों से न आ पाए हों, लेकिन ये गीत लोक में गाये जाते रहे हैं. इन गीतों से हम घुघुती के लोक में गहरे तक समाई छवि को समझ सकते हैं. एक बहुत पुराना बांसती गीत है जिसमें पूरे चैत्र मास के वर्णन के साथ प्रकृति का खूबसूरत वर्णन करते हुए घुघुती के बासने के साथ अपनी याद को जोड़ा गया है-

फूल फूलीन अनमन भेति मांजी,
बांज-बुरांस की कोंपली मौली।
कखी घुघुती घुरली प्यारी,
कखी कफू बालो डाली रुणंली।।

घुघुती के संदेश को लेकर एक बहुत पुराना लोकगीत और भी है, जिसमें घुघुती की बोल और मैत की खुद लगने को बहुत मार्मिक तरीके से कहा गया है. नायिका कहती है कि दीदी बसंत ऋतु लौट आई है जैसे दाईं का फेरा. हिलांस ने पर्वतों पर बसेरा कर लिया है. शिखरों पर तुरांस का फूल का डोला सज गया है. फूल वाले पौधें पर दीदी मधुमक्खियों के हिंडोले पड़ गए हैं. पेड़-पौधों पर कोपल आ गई है. पर्वतों पर फूल खिल आए हैं. मेरी आंखों में दीदी, कांटे से नाचने लगे हैं. घुघुती घुर-घुर करती है. मुझे मायके की याद आ रही है. मेरा मन झुरता है-

रितु बौड़ी आए दीदी, दाई जसो फेरी,
करे हिलाॅस्योंन दीदी, पर्वतत मा बसेरो।
डांडू सजी ेए दीदी, बुरांस को डोला,
फुलेर डाल्यों दीदी, मार्यों का हिंडोला।
मेरी आंख्यों मा दीदी, नाचदा-सा कांडा,
म्योलड़ी बासली दीदी, घुघुती घुरदी,
मैं खुद लगदी दीदी, जिकुड़ी झूरदी।

घुघुती न केवल विरह या खुद के गीतों की नायिका है, बल्कि वह बदलती ऋतु और प्रकृति को भी संबोधित करती रही है. इसी तरह के एक पुराने गीत में कहा गया है-

आई गैन रितु बौड़ी दाई जसो फेरो,
उबा देसी उबा जाला ऊंदा देसी ऊंदा।
झपन्याली डाल्यों मा घुघुती घुराली
उच्चि-उच्चि डाड्यों मा कफू पंछि बासलो।

घुघुती के माध्यम से अपने दुख-सुख कहने की लोकगीतों की परंपरा बहुत पुरानी होते हुए भी इतनी महत्वपूर्ण विधा बन गई है कि आज के आधुनिक समय में जब हमारे पास बहुत सारे साधन हैं अपनी बात कहने के, तब भी हमें यही प्रतीक ज्यादा अच्छे संप्रेक्षण वाले लगते हैं. यही वजह है कि कभी लोक में प्रचलित ये गीत आज भी कई बार जुबान पर आ जाते हैं-

कूटला को बेंड माजी, कूटला को बेंड,
सासू जीन करे मांजी, जिकुड़ी को छेंड।
मसेटो मेवायो मांजी, मसेटो मेवायो,
सरापी जायान मांजी, मुघुरू बेवायो।
घुघुती घुराई मांजी, घुघुती घुराई,
ब्वै का लाड़ा ब्वै मू होला मैं बेरी दुराई।

इसी प्रकार का एक और गढ़वाली लोकगीत है जिसमें विवाहिता कहती है कि घुघती तू मेरे मैत के देश की ओर मत बोल. मेरी मां सुनेगी तो आंसू गिरायेगी. पिता सुनेंगे तो सास को मनाने आ जाएंगे. और ननद सुनेगी तो ताना मारेगी-

मेरा मेता का देश न बास घुघुती रुमझुम।
बोई सुणली आंसू ढोलली, आंसू ढोलली रुमझुम।
बाबा सुणलो सासू मनालो, सासु मनालो रुमझुम।
नण्द सुणली ताणा मारली, ताणा मारली रुमझुम।

एक कुमाऊनी लोकगीत में भी एक विवाहिता घुघुती से कहती है कि मेरे मायके के देश की तरफ जाकर बोल. वहां मेरी मां अगर तेरी आवाज सुनेगी तो मेरी खोज-खबर करेगी, मेरे लिये भैटोली भेजेगी-

जा बासा घुघुती मैत का देशा,
ईजा मेरी सुणली तो भैटोली भेजेली.

विरह में डूबी एक विवाहिता भी घुघुती से बात करते हुए एक गीत में अपनी व्यथा कहती है-

पार भीड़ा घुघुती बासी रुमाझुम
मेरा हिया भरि ऊंछ रुमाझुम
तेरा बोल भला लागी रुमाझुम
तै डाना कफू बासी रुमाझुम।

घुघुती जोहार के लोकगीतों में भी उसी तरह उपस्थित है जैसे कुमाउनी-गढ़वाली में. जोहार के एक लोकगीत में प्रियतमा अपने प्रेमी को याद करते हुए कहती है- हे प्रियतम! तुम उदासी के दिनों में बाटुली मत लगाना क्योंकि पहाड़ की चोटियों में घुघुती गा रही है और ऐसे में मेरी इस बाली यौवन को तुम जैसे निर्मोही की याद बहुत सताती है. इसलिए प्रियतम! या तो तुम मुझे अपने संग ले चलो, या जहर देकर मार डालो-

ह्यूं पड़ो छिना में सुवा
मैं बाटुली झन लाये, उदासी दिनों मां।
झुपर्याली हाडी मां घुघुती घरै छ,
यो बाली जौबन मेरो, पापी ले झुरै छ।
तली तीयूं मलि छिरकानी, बीच में नहर,
कित ल्हीजा पाफी संग कि दी जा जहर।

घुघुती सिर्फ लोकगीतों में ही नहीं है, बल्कि घुघुती को लेकर कई लोक कथाएं भी हैं. एक बालगीत उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल में समान रूप से सुना-गाया जाता है. ये लोरी गीत के रूप में सबसे पहले पहचाना जाता है. इस गीत को छोटे बच्चों को खिलाने के लिए भी गाया जाता रहा है. बच्चों को घुटनों पर लिटाकर एक विशेष भव-भंगिमा के साथ ये बाल-गीत गाया जाता है. पुरानी पीढियां तो इसी गीत को सुनकर और गाकर बड़ी हुई हैं ये लोकप्रिय गीत है-

घुघुती-बासूती
कौ खालो दुद-भाती
घुघूती बासूती
माम कां छू- मालकोटी
के ल्यालो दुद भाती
को खालो दुद भाती
भौ खालो दुद भाती।

इस बाल-गीत के साथ एक मार्मिक लोककथा भी है – ‘एक विवाहिता से मिलने उसका भाई उसके ससुराल आया. वो बहन के लिये भिटौली लाया था. बहुत सारा सामान और मिठाई. कई कठिन रास्ते पार कर वो अपनी बहन के ससुराल पहुंचा था. जब वो पहुंचा तो बहन सो रही थी. उसने अपनी बहन को उठाना उचित नहीं समझा. वो बहुत देर उसके पास बैठ कर उसके उठने की प्रतीक्षा करता रहा. लेकिन काफी देर तक भी वो नहीं उठी तो उसने बहन के गले में पहने चर्यो यानी मंगलसूत्र को पीछे की तरफ कर उसके माथे में रोली-अक्षत लगाया और अपने घर की ओर चल दिया.

उसने सपने में देखा कि उसका भाई उसके लिये भिटौली लाया है. वो आंखें मलते हुए जब उठी तब तक भाई पहाड़ों के पार दूर निकल चुका था. उसने अपने मंगलसूत्र को पीछे की ओर देखा. वह कुछ समझ पाती तभी उसने देखा कि उसके बिस्तर के पास बहुत सारे फल, सामान और मिठाई रखी है. किसी ने उसे बताया कि उसका भाई उससे मिलने आया था, लेकिन वो सोई थी. उसे बहुत दुख हुआ कि भाई इतनी दूर से उससे मिलने आया लेकिन भूखा-प्यासा उससे मिले बिना चला गया और वह सोती ही रह गई. कहते हैं कि वो अपने भाई के वियोग में इन्हीं पंक्तियों को गाते-गाते मर गई. उसी ने फिर घुघुती चिड़िया के रूप में जन्म लिया. लोक में एक बात प्रचलित है कि घुघुती के गले में जो मोती की तरह पिरोये निशान है वह उसके चरेऊ यानी मंगलसूत्र के हैं. इसलिये आज भी यह गीत इस रूप में प्रचलित है-

घुघूती बासूती
भै भूखो, मैं सिती…’

घुघुती के साथ हम कहां तक चले आए. लोकगीतों से बाल-गीत तक, घुघुती का सफर थमता नहीं. वह रुकता नहीं. वह हर पल-हर क्षण हमारे आसपास रहती है. हमारे त्योहारों में, हमारे उत्साह और उत्सवों में, मेले-ठेलों में, लोक-कथाओं और गाथाओं में. पहाड़ के सबसे प्रसिद्ध त्योहार उत्तरैणी अर्थात मकर संक्राति का भी घुघुती से गहरा संबंध है. इसे लोक की भाषा में ‘घुघुतिया त्यार’ भी कहा जाता है. इस त्योहार में भी बच्चे घुघते की माला बनाकर अपने गले में टांगकर कौवों को खिलाते हैं और गाया जाता है:

काले कव्वा काले, घुघुती माला खाले
ले कव्वा बड़, मैकें दिजा सुनक घ्वड़।
ले कव्वा ढाल, मैके दिजा सुनक थाल।

कुल मिलाकर घुघुती हिमालयी संस्कृति में गहरे तक समाया एक ऐसा पक्षी है, जिस पर सबसे अधिक गीत, कविताएं और लोक-कथायें बनी हैं. पहाड़ों का चैत्र-मास अपने साथ खुद कुछ यादें और नराई लेकर आता है. घुघुती हिमालयी लोक में इस तरह से रची-बसी है कि इसके बिना पहाड़ के लोक-जीवन की परिकल्पना नहीं की जा सकती है.

घुघुती को हमेशा से अपने परिजनों की कुशलक्षेम जानने का संदेश वाहक माना जाता रहा है. खासतौर पर चैत्र मास में पहाड़ी गांवों के जंगलों से निकलती घुघुती की सुरीली आवाज डांडी-कांठियों में गूंजती है. जिसको सुनकर बेटी-बहुओं को अपने मायके की याद आती है. घुघुती ही है जो उन्हें मैत की खुद-नराई भी लगाती है और मायके वालों को रैबार और कलेऊ-भिटौली की याद भी दिलाती है. खुदेड़ और न्योली गीतों की आत्मा घुघुती के स्वरों को सुनना एक तरह से हिमालय की महिलाओं के उस संघर्षपूर्ण जीवन और उससे निकलने वाली मानवीय संवेदनाओं को समझना भी है जो किसी पक्षी के स्वरों में अपने दुख-दर्द और विरह को संदेशवाहक बना देती है.

कितना बड़ा संसार है उन उम्मीदों का, आकांक्षाओं का, प्रेम से भरी उस यौवना का जो दूर अपने पति की कुशल और आने की आस को हर वर्ष उसी तरह सुन सकती है- घुघुती के स्वरों में. विषम भौगोलिक परिस्थिति वाले हिमालयी क्षेत्र में कठिन जीवन के बीच अपने मायके वालों की याद में हर साल आने वाली कलेऊ-भिटौली के संदेश को भी वह उसी पक्षी से सुन पाती है. घुघुती ही बताती है कि उसके मायके वाले उसे इसी चैत्र महीने में याद करते हैं. घुघुती केवल एक पक्षी नहीं, वह उन ध्यांणियों का जीवन आधार है जो एक अथाह प्रेम-स्नेह- वात्सल्य की धारा में विलीन हो जाती हैं. उसे स्वर देती है घुघुती.

स्क्रिप्ट : वरिष्ठ पत्रकार चारु तिवारी

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