जनकवि गिरीश तिवाड़ी ‘गिर्दा’

  • 2025
  • 26:24

27 नवंबर 1977. नैनीताल शहर के माहौल में एक तनाव साफ-साफ महसूस किया जा सकता था. अगली सुबह यहाँ के जंगलों की नीलामी होनी थी जो भारी विरोध के चलते पहले कई बार स्थगित हो चुकी थी. लेकिन इस बार प्रशासन ने ठान लिया था कि विरोध के तमाम स्वर कुचल दिए जाएं. नैनीताल में धारा 144 लागू कर दी गई थी और PAC के जवान नैनी झील के चारों ओर फ़्लैग मार्च कर रहे थे. शहर के जो जागरूक लोग नीलामी के ख़िलाफ़ आवाज उठाते रहे थे, उनकी गिरफ़्तारी के वारंट जारी किए जा चुके थे. ऐसे में वो तमाम लोग भूमिगत हो गए थे लेकिन एक बेचैनी उन्हें अंदर ही अंदर खाए जा रही थी. वो चिंतित थे कि विरोध नहीं किया गया तो सरकार पहाड़ के पहाड़ नीलाम कर देगी. नैनीताल के एक छोटे-से कमरे में बैठकर इन्हें में से कुछ युवा मंथन कर रहे थे कि अगली सुबह ऐसा क्या किया जाए कि नीलामी के ख़िलाफ़ लोग लामबंद हो सकें. तभी एक युवा ने सुझाव दिया कि साल 1924 के जंगल सत्याग्रह के दौरान गौर्दा ने ‘वृक्षन का विलाप’ शीर्षक से एक कविता लिखी थी. क्यों न उसे ही हथियार बना लिया जाए? ये सुझाव सभी को पसंद आया तो रातों-रात गौर्दा की वो किताब स्मगल की गई. 1924 की कविता को आधार बनाते हुए उस रात एक नई कविता रची गई, उसी रात इस कविता की धुन भी बनाई गई और फिर अगली सुबह जो हुआ वो हमेशा-हमेशा के लिए इतिहास में दर्ज हो गया. इस कविता से प्रतिरोध के इतने मजबूत स्वर उभरे कि पूरा शहर लामबंद हो गया और सरकार को जंगलों की नीलामी रोकते हुए घुटने टेकने पड़े. 27 नवम्बर 1977 की उस रात जो कविता रची गई थी वो आगे चलकर प्रतिरोध की प्रतिनिधि रचनाओं में से एक बनी. इसे रचने वाले व्यक्ति का नाम था गिरीश तिवाड़ी ‘गिर्दा’ और इस कविता के बोल थे:

“आज हिमाल तुमन कै धतयु छो,
जागो-जागो हो मेरा लाल,
नि करि दी हालों हमरी नीलामी,
नि करि दी हालों हमरो हलाल…”

10 सितंबर 1943 के दिन अल्मोड़ा जिले के एक छोटे से गाँव ज्योली में जीवन्ती देवी और हंसा दत्त तिवाड़ी के घर जन्में गिरीश कुल 1 बहन और 4 भाई थे. बड़ी बेटी के जन्म के बाद ही जीवन्ती देवी ने अपनी आँखें खो दी थी इसलिए वो अपने बेटों के चेहरे कभी नहीं देख पाई. पिता PWD सिक्किम में कार्यरत थे. इसीलिए कुछ समय बाद उन्होंने अपना परिवार अपने छोटे भाई बदरी दत्त तिवारी के संरक्षण में अपने पैतृक गाँव ज्योली भेज दिया. गिरीश का बचपन इसी गांव में बीता और शुरुआती शिक्षा भी यहीं हुई. इसके कुछ समय बाद जब उनका दाख़िला अल्मोड़ा के सरकारी इंटर कॉलेज में हुआ तो वे अपनी बड़ी बहन के साथ अल्मोड़ा में ही रहने लगे.

स्कूल के दिनों में गिरीश का मन कभी पढ़ाई-लिखाई में नहीं लगा. तब किसी ने भी नहीं सोचा था कि चंचल स्वभाव वाला यही गिरीश एक दिन अपनी रचनाओं और लेखन से ही पाहचान बनाएगा और जनता का लोकप्रिय गिर्दा बन जाएगा. गिर्दा के भांजे रमेश चंद्र मिश्र उन्हें ‘नानू मम्मा’ कह कर बुलाया करते थे. पहाड़ में प्रकाशित एक लेख में वो लिखते हैं, ‘मेरे दो मामा रजनी कुमार और गिर्दा हमारे यहाँ रह कर ही पढ़ा करते थे और वहीं से उन्होंने हाई स्कूल पास किया. लेकिन नानू मम्मा का मन पढ़ाई में कम ही लगता था. मेरे चाचा घनश्याम वहीं इंटर कॉलेज में अध्यापक थे. वो नानू मम्मा की परीक्षा की कापियाँ माँ यानी गिर्दा  की बहन के सामने पटकते हुए कहते थे, ‘यो छन तूमार भाईक करतूत.’ हाईस्कूल के बाद गिर्दा ने शायद 11वीं में एडमिशन तो लिया लेकिन वापस गाँव चला गया.’

फिर कुछ समय बाद गिर्दा गांव से भागकर लखनऊ चले गए. यहां जीवन-यापन के लिए उन्होंने रिक्शा तक चलाया. उनके घर से भागने के पीछे की कहानी बताते हुए कथाकार नवीन जोशी लिखते हैं, ‘युवा होते-होते गिर्दा को मोहब्बत की चोट खानी पड़ी. यह पहला प्यार ही था और हरगिज़ एकतरफा न था. लेकिन दोनों एक दूसरे के हो भी न सके. मन की यह गांठ वह कभी खोलता न था लेकिन एक बार किसी बहाने मेरे सामने थोड़ा खुल ही पड़ी थी. मुझे पक्का लगता है कि अल्मोड़ा से भागने के पीछे मुहब्बत की यह चोट ही रही होगी. इसीलिए कहता हूँ कि वह कुछ बनने के लिए नहीं भागा था. अपने टिन के बक्से में लाल और क्रीम कलर की एक साड़ी छुपाये वह पूरनपुर, पीलीभीत, लखनऊ और अलीगढ़ की तरफ भटकता फिरा.’

वैसे गिर्दा के घर से भागने के बारे में एक अन्य सम्भावना भी जताई जाती है. इस बारे में धर्मवीर सिंह परमार लिखते हैं कि ‘बचपन से ही गिर्दा में गलत बातों का विरोध करने का गुण रहा. लगभग 1960 में उन्होंने अपने गले में हुड़का डाल लिया था. घर में इस बात को लेकर खूब कहा सुनी भी हुई थी जिसके बाद वो लखनऊ चल गया.’

दरअसल हुड़का एक छोटा-सा वाद्य यंत्र होता है जिसे एक हाथ से पकड़कर दूसरे हाथ से बजाया जाता है. ये वाद्य यंत्र भी मानव समाज की तरह ही जाति की बेड़ियों में बंधा रहा है. इसके अमूमन दलित समाज के लोग अपनी आजीविका के लिए बजाते रहे हैं जिन्हें हुड़की या बादी कहा जाता है. जबकि गिर्दा ब्राह्मण परिवार से थे. ऊपर से पिता सरकारी कर्मचारी और चाचा सुप्रसिद्ध वैद्य. इसलिए उनका हुड़का बजाना परिवार वालों को पसंद नहीं था.

घर से भागकर लखनऊ में कुछ समय काम करने के बाद गिर्दा पीलीभीत के पूरनपुर चले गए जहां उन्होंने लोक निर्माण विभाग में वर्कचार्जी यानि मजदूरों से काम करवाने की नौकरी मिल गई. यही वो समय था जब गिर्दा ने जीवन के कठोर पाठ पढ़े और यहीं से उन्होंने वामपंथी राजनीति भी समझी. उन्होंने मजदूरों और किसानों की व्यथा को नज़दीक से देखा और शायद यहीं से उनके जीवन में एक फक्कड़पन भी आया. पूरनपुर में ही उनकी मुलाकात PWD में काम कर रहे दुर्गेश पंत से हुई थी. फिर साल 1967 में मशहूर गीतकार और रंगकर्मी बृजेंद्र लाल शाह ने गिर्दा को ‘गीत एवं नाटक प्रभाग’ में आवेदन करने के लिए प्रेरित किया और गिर्दा स्थायी नौकरी के लिए चुन लिए गए. बृजेंद्र लाल शाह खुद भी उस समय नैनीताल स्थित गीत एवं नाटक प्रभाग में कार्यरत थे. इसी नौकरी में रहते हुए गिर्दा को कर्नल गुप्ते और लेनिन पंत जैसे दिग्गजों के साथ काम करने और रंगमंच की बारीकियाँ सीखने का मौका मिला. धीरे-धीरे गिर्दा  स्क्रिप्ट, कोरस और गीत भी लिखने लगे. नवीन पांगती इस बारे में लिखते हैं, ‘गिर्दा अपने काम में इतना मगन हो गया था कि एक बार रुद्रपुर में ‘मोहिल माटी’ के मंचन के दौरान वो स्टेज से 8-10 फुट नीचे गिर गया. दर्शकों में खलबली मच गई लेकिन गिर्दा ने अपने हाथ से माइक नही छूटने दिया और जल्दी से उठकर वापस स्टेज पर चढ़ गया.’

साल 1968 में दुर्गेश पंत के साथ मिलकर गिर्दा ने कुमाउनी कविताओं का संग्रह ‘शिखरों के स्वर’ प्रकाशित किया जिसे एक अभूतपूर्व पहल के रूप में दर्ज किया गया. गीत एवं नाटक प्रभाग के कामों की वजह से गिर्दा का लखनऊ के आकाशवाणी केंद्र में भी आना-जाना शुरू हो चुका था. इसी दौरान सुमित्रानंदन पंत, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला और मिर्जा गालिब जैसे कवियों का उन्होंने अध्ययन किया और उनका लेखन भी इन लोगों से प्रभावित होता रहा. अब संघर्षों का वो दौर भी शुरू होने ही वाला था जिसमें ढलकर गिरीश तिवाड़ी को जनता का गिर्दा बन जाना था. 1970 के दशक की शुरुआत से ही अविभाजित उत्तर प्रदेश के पहाड़ों में जंगलों के दोहन एक नया दौर शुरू हुआ. विकास के नाम पर धड़ा-धड़ जंगल काटे जाने लगे और इसके लिए सरकार प्राइवेट ठेकेदारों को टेंडर बाँटने लगी. पहाड़ी लोगों के लिए उनके जंगल सिर्फ़ दैनिक जीवन के साधन ही नहीं बल्कि संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रहे हैं. ऐसे में यहाँ जंगलों की खुली नीलामी और कटान के खिलाफ आंदोलन शुरू हुए. ये वन आंदोलन अपने चरम पर तब पहुंचे जब चमोली के रैणी गाँव की महिलाओं ने पुरुषों की अनुपस्थिति में पेड़ों से चिपककर उनको कटने से बचाया और चिपको आंदोलन देश-दुनिया में जाना गया. शुरुआती दौर में गिर्दा ने इन आंदोलनों में कोई सक्रिय भूमिका नही निभाई. फिर 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पूरे देश में इमरजेंसी लगा दी. इस इमरजेंसी के बीच ही जन्म हुआ नैनीताल की सुप्रसिद्ध नाट्य संस्था ‘युगमंच’ का. गिर्दा भी शुरुआत से ही इस से जुड़ गए. धरमवीर भारती के नाटक ‘अंधा युग’ की ऐतिहासिक प्रस्तुति DSB कॉलेज में हुई जिसका निर्देशन लेनिन पंत ने गिर्दा और वासुदेव त्रिपाठी को साथ में लेकर किया. इमरजेंसी के दौरान ही गिर्दा ने शासन का विरोध करने वाले भारतेन्दु हरिश्चंद्र द्वारा लिखा गया नाटक ‘अंधेर नगरी चौपट राजा’ का निर्देशन भी किया. इसके बाद गिर्दा ने पीछे मुड़कर नही देखा और इमरजेंसी का विरोध करते हुए अपने बहुचर्चित नाटक ‘नगाड़े खामोश हैं’ और ‘धनुष यज्ञ’ लिखे. अब गिर्दा नाटकों के लिए गीत और कोरस के अलावा कविताएं भी लिखने लगे थे और उनके कवि सम्मेलनों में जाने का सिलसिला भी शुरू ही चुका था.

साल 1977 में आपातकाल खत्म हुआ और केंद्र में इंदिरा गांधी को हराकर मोरारजी देसाई पहले गैर-कांग्रसी प्रधानमंत्री बने. सरकार तो बदल गई लेकिन पहाड़ों के हालात वही बने रहे. प्रदेश सरकार पहले की तरह ही जंगलों को नीलाम करती रही. 28 नवंबर 1977 के दिन नैनीताल में वनों की नीलामी होनी थी. गिर्दा और उनके साथी इस नीलामी को रोकने और इसके विरोध के लिए पिछले कई दिनों से मंथन कर रहे थे. इसी मंथन के दौरान शेखर पाठक ने सुझाव दिया कि साल 1924 में लिखी गई गौर्दा कि कविता ‘वृक्षण को विलाप’ के आधार पर कुछ रचा जाए और तब गिर्दा ने कविता रची:

‘आज हिमाल तुमन कै धतयु छो
जागो, जागो हो मेरा लाल.’

इस कविता को गाते हुए जब गिर्दा और उनके साथी नैनीताल की सड़कों पर निकले तो उनके पीछे धीरे-धीरे लोग जुटना शुरू हो गए. प्रशासन भी पूरी तरह से मुस्तैद था इसलिए भीड़ का नेतृत्व कर रहे सभी लोगों को गिरफ्तार कर 36 किलोमीटर दूर हल्द्वानी थाने भेज दिया गया. लेकिन दोपहर होते-होते नैनीताल शहर में एक ऐसी घटना हुई कि प्रशासन के हाथ-पाँव फूल गए और सरकार को नीलामी टालनी पड़ी. इस घटना के बारे में नवीन पांगती लिखते हैं, ‘दोपहर में छुट्टी के टाइम CRST कॉलेज के बच्चे जब झुंड में बाहर निकले तो उन्हें आंदोलनकारी समझकर फायर ब्रिगैड वालों ने उन पर पानी की बौछार कर दी. सकपकाए छात्रों ने भी प्रतिक्रिया में पत्थर फेंके तो पुलिस वालों ने ताबड़तोड़ लाठी चार्ज कर दिया. भगदड़ मच गई. आग की तरह बात शहर भर में फैली और आधे घंटे में ही डीएसबी कॉलेज से छात्रों का जुलूस शैले हॉल की तरफ बढ़ा. हुजूम को आते देख पुलिस ने लोगों पर गोलियां बरसा दी. हुड़दंग शुरू हुआ और देखते-देखते शैले हॉल आग के हवाले कर दिया गया. उधर हल्द्वानी थाने में बंद वन आंदोलनकारियों को तो पता भी नहीं था कि बाहर क्या हो रहा है. गिर्दा वहाँ भी कैदियों को कविताएं सुना रहा था. 6 घंटे बाद शाम को उन्हें यह कहते हुए रिहा किया गया कि नीलामी रोक दी गई है. बाहर आकर उन सब को पता चला की नैनीताल क्लब जल चुका है और शहर में खूब आगजनी हुई है.’

अगले दिन ये सभी लोग हल्द्वानी से वापस नैनीताल आए और फिर उसी शाम को गिर्दा अपना हुड़का लेकर सड़कों पर निकल पड़े. कुछ देर बाद गिर्दा और उनका हुड़का दोनों ही मल्लीताल के रामलीला मैदान में गरज रहे थे. लेकिन इस बार विरोध में कुछ बदलाव था. इस बार गिर्दा और उनके कुछ साथियों के साथ पूरा शहर शामिल था. हजारों लोग इकट्ठा होकर उन्हें सुन रहे थे. गिर्दा का ‘आज हिमाल तुमन कै धतयुछौ, जागो-जागो हो मेरा लाल’ गाना हिमलाय की पुकार बन चुका था और लोगों को झकझोर रहा था. गिर्दा लोगों दिल-ओ -दिमाग़ में छा चुके थे, उनके साथी बन चुके थे. आंदोलन में उनकी कविताओं के माध्यम से लोगों को जोड़ा जाने लगा. गिरीश तिवाड़ी अब जन-कवि गिर्दा बन चुके थे. उनके हुड़के की थाप यहां से बढ़ती ही चली गई. वन आंदोलन हो या नदी बचाओ आंदोलन, नशा मुक्ति आंदोलन हो या फिर उत्तराखंड आंदोलन. गिर्दा की कविताएं प्रखर होती चली गई. उनके गीत तमाम जुलूसों और जलसों में गाए जाने लगे. गिर्दा खुद सड़कों से लेकर सभाओं और कवि सम्मेलनों से लेकर गोष्ठियों तक में छाए रहते.

1980 के दशक में पहाड़ के युवा नशे की गिरफ़्त में आ रहे थे और इससे यहां की आर्थिक और सामाजिक स्थितियाँ भी काफी खराब होने लगी थी. इसके खिलाफ फरवरी 1984 में ‘नशा नहीं, रोजगार दो आंदोलन’ शुरू हुआ. इस आंदोलन का प्रमुख नारा था ‘जो शराब पीता है वह परिवार का दुश्मन है, जो शराब बेचता है वह समाज का दुश्मन है, और जो शराब बिकवाता है वह देश का दुश्मन है.’ महिलाओं ने इसमें बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया क्योंकि वो ही इससे सबसे ज्यादा पीड़ित भी थी. शराब पहाड़ी जिलों में सरकार के राजस्व का एक बड़ा स्रोत था. प्रशासन खुद शराब का व्यापारी था इसलिए आंदोलन को दबाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाए गए. आंदोलन में शामिल लोगों को धमकियाँ दी गई, झूठे मुकदमों मे फँसाया गया और खूब गिरफ्तारियाँ भी हुई लेकिन आंदोलन नहीं रुका. इस आंदोलन का नेतृत्व ‘उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी’ कर रही थी. गिर्दा खुद वाहिनी के सदस्य थे इसलिए उनका आंदोलन में कूदना स्वाभाविक था. इस आंदोलन के लिए भी उन्होंने गीत लिखे जिनमें से एक था, ‘धरती माता तुम्हारा ध्यान जगे.’

‘नशा नहीं रोज़गार दो’ आंदोलन में गिर्दा सक्रिय थे लेकिन व्यक्तिगत तौर पर वे ख़ुद भी बीड़ी और शराब के आदि थे. ये आदत इतनी गहरी थी कि इस आंदोलन के दौरान जब उन्होंने अचानक पीना छोड़ा तो बीमार पड़ गए. ‘पहाड़’ में प्रकाशित एक लेख में महेश पांडे ने इस बारे में लिखा है कि, ‘उसके कितने रूप गिनाऊँ. रानीखेत में ईज़ा का प्यारा बेटा हो जाता था, तो भाइयों और बहन का दद्दा. एक तरह से देखें तो वह था तो अजातशत्रु, लेकिन अपनी आदतों से अपना शत्रु भी खुद ही था.’

गिर्दा का व्यक्तिगत जीवन सादगी और संवेदनशीलता से भरा था. सबको प्यार से ‘बब्बा’ कहकर बुलाना और अपने से छोटी उम्र वालों को भी समतुल्य समझकर उन्हें महत्व देनी जैसी आदतों के चलते वो सबके दोस्त हो जाते थे. नैनीताल क्लब चौराहे के पास ही दुकान के एक छोटे से कमरे में वो रहा करते थे. उनके साथ ‘राजा’ और उनका बेटा ‘प्रेम’ भी रहते थे जिसे गिर्दा प्यार से पिरम बुलाते थे. धर्मवीर सिंह परमार लिखते हैं, ‘एक दिन राजा अपनी पत्नी और बच्चे के साथ कहीं जा रहा था की पिरम यानी प्रेम अकेला सड़क में आगे-आगे जाने लगा. दूसरी तरफ से अचानक गाड़ी आ गई. दौड़कर राजा की पत्नी ने अपने बच्चे को खींचकर किनारे किया लेकिन गाड़ी से खुद को नही बचा पाई. रोता हुआ राजा अपने बच्चे को पकड़कर सड़क पर जा रहा था कि गिर्दा से उसकी मुलाकात हुई और गिर्दा उसे अपने साथ ले आए. उसके बाद एक ही कमरे में गिरदा, राजा, पिरम और मेहमान बड़े मजे से रहते थे. यहाँ तक कि बाबा नागार्जुन जैसे साहित्यकार भी उस कमरे में पाए गए.’

10 जून 1987 के दिन गिर्दा का विवाह हुआ. उनकी पत्नी हीरा तिवारी अपने विवाह वाले दिन को याद करते हुए लिखती हैं, ‘इनके कहने पर हमारी कुंडली नही मिलाई गई. वैसे तो वो पूजा पाठ को नही मानते थे लेकिन कहते थे की तुम करोगी तो मैं मना भी नहीं करूंगा. पीठया लगाओ कहने पर लगा भी लेते थे लेकिन आगे जाकर मिटा देते थे. हमारी शादी के दिन सिर्फ 3 फेरे ही हुए थे कि उतने में ही पंडित जी से बस करो, बस करो कह दिया था. शादी में न कुछ लिया और न कुछ दिया.’

उनके विवाह के दिन को याद करते हुए उनके मित्र राजीव कटियार लिखते हैं, ‘हाँ गिरदा, सन सत्तासी में तेरी बारात में शामिल होने का मौका मुझे मिला ठेरा. वैसे बारात तो थी नहीं, शायद तुमने सब चाहने वालों को कड़ाई से बराज दिया होगा. अलबत्ता जन नाट्य मंच अल्मोड़ा के दो-चार साथियों के साथ, हम कुछ लौंडे-लपाड़े, तुम्हारे साथ लग लिए थे. पहाड़ के टॉप पर हीरा भाभी का घर. चतुर्दिक खुला वितान, खिड़की दरवाजों से बादलों का आवागमन. गए और चाय-नाश्ता कर के लौट आए.’

शादी के बाद गिर्दा पहले गायत्री निवास रहे और फिर कैलाखान रहने आ गए. उनका एक बेटा हुआ जिसे बाबा नागार्जुन ने नाम दिया तुहिनांश.

मशहूर कवि और लेखक मंगलेश डबराल ने गिर्दा  के जीवन और कार्य की समीक्षा करते हुए उनकी तुलना बाबा नागार्जुन से की. उन्होंने इस बारे में लिखा कि ‘यह कहने की इच्छा होती है कि गिर्दा पहाड़ के नागार्जुन हैं. गिर्दा का व्यक्तित्व भी नागार्जुन से मिलता है- उसी तरह की फकीरी, फक्कड़पन, यायावरी और समाज से गहरा लगाव. अपने जन की नियति बदलने की वैसी ही बेचैनी और निजी जीवन के दुखों-अभावों की उधेड़बुन से बेपरवाही. बाबा और गिर्दा दोनों के जीवन में मनुष्य और समाज को बदलने की निरंतर कोशिश है.’

उत्तराखंड आंदोलन में भी गिर्दा पूरी तरह से सक्रिय रहे थे. अलग राज्य की मांग वैसे तो काफी पहले से थी लेकिन धारदार आंदोलन की शक्ल उसने 90 के दशक में ली. लोगों तक अपनी बातें पहुँचाने के लिए अल्मोड़ा अखबार की तर्ज पर ही नैनीताल समाचार की स्थापना की गई और गिर्दा इसका अभिन्न हिस्सा बने. आक्रामक रूप से सरकार का विरोध करने के कारण अल्मोड़ा अखबार को बंद होना पड़ा था, लेकिन नैनीताल समाचार को इस बात से कोई फर्क नही पड़ा और लगातार आंदोलन से संबंधित मुद्दों और खबरों को छापता रहा.

हीरा तिवारी लिखती हैं कि ‘उत्तराखंड आंदोलन के समय वे बहुत सक्रिय रहे. आज यहाँ, कल वहाँ. मैं और तुहिन भी साथ चल लेते थे कभी-कभी. नैनीताल में तो साथ रहते ही थे. तुहिन छोटा था. तिवारी जी उसे कंधे में बीठा लेते थे.’

गिर्दा उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी का एक मजबूत हिस्सा भी रहे. 1994 के आसपास जब उत्तराखंड आंदोलन अपने चरम पर पहुंचा तो गिर्दा की ‘जैंता एक दिन तो आलो, ऊ दिन ये दुनी में’ और ‘धरती माता तुम्हारा ध्यान जगे’ जैसे कविताओं ने लोगों को लामबंद करने में अहम भूमिका निभाई.

साल 1996 में गिर्दा ने गीत एवं नाट्य विभाग की नौकरी छोड़ दी और उत्तराखंड आंदोलन को लेकर लोगों के साथ सीधा सड़कों पर उतर पड़े. उन्होंने अपनी कविताओं से राज्य आंदोलन की माँग को तो मज़बूती दी ही साथ में वो रूपरेखा भी दिखाई कि पृथक उत्तराखंड राज्य कैसा होना चाहिए. इस बारे में गिर्दा ने कविता कही:

कस होलो उत्तराखंड, कां होली राजधानी,
राग- बागी यों आजी कार्ला आपूनी मनमानी.
यो बतौक बुली- खुलास गैरसैन करुलो.
हम लड़ते रयां भूली, हम लड़ते रुला.
टेम्पुरेरी-परमानैन्टै की बात यों करला,
दून-नैनीताल कौला, आपुंण सुख देखला,
गैरसैंण का कौल-करार पैली कर ल्हूयला।
हम लड़्ते रयां भुली, हम लड़्ते रुंल…”

साल 2001 में गिर्दा को दिल का दौरा पड़ा जिससे बाद उनका शरीर काफी कमजोर हो गया था. लेकिन न तो उन्होंने अपना कवित्व छोड़ और न ही जन सक्रियता. शारीरिक रूप से काफी बीमार होने के बाद भी वो लेखन और जन जागरण के कार्यों से जुड़े रहे. 2002 में उत्तराखंड आंदोलन और उत्तराखंड काव्य पर केंद्रित गिर्दा की कविताओं और गीतों का नया संकलन प्रकाशित किया गया. गिर्दा कहीं भी रहे हों उन्हें अपने पैतृक गाँव ज्योली की हमेशा याद आती रही. उसे याद करते हुए उन्होंने लिखा था-

तुम बहुत याद आती हो ज्योली मुझे
ज़िंदगी की डगर में हरेक शाम पर
मौसमी सीढ़ियों के हर पायदान पर
तुम बहुत ही सताती हो ज्योली मुझे
तुम बहुत याद आती हो ज्योली मुझे.

गिर्दा  के बारे में कम ही लोग जानते हैं कि उन्होंने फीचर फिल्मों में भी काम किया था. भगवती चरण वर्मा की कहानी ‘वसीयत’ के ऊपर इसी नाम से राजीव कटियार ने फीचर फिल्म बनाई जिसके मुख्य किरदार जनार्दन जोशी का रोल गिर्दा ने निभाया था. फिल्म की शूटिंग को याद करते हुए राजीव लिखते हैं, ‘फिल्म का आधे से अधिक भाग जनार्दन जोशी का वसीयत पाठ है. आचार्य के पूरे कुनबे के सामने गिर्दा का काम 4-5 दिन बाद शुरू होना था. वे थोड़े उद्विग्न थे- मुझे क्या करना होगा राजीव? मुझसे होगा न? दरअसल 4-5 दिन खाली बैठना, जब शूटिंग चल रही हो, उन जैसे सक्रिय इंसान के लिए कठिन था, उन्हें बेचैन बना रहा था. खैर जब उनका गुबार जमीन पर बैठ गया, गाड़ी टाइम टेबल से दौड़ने लगी तो फिर उन्हें ‘डायरेक्ट’ करने की कभी जरूरत नहीं पड़ी.’ फिल्म की ज्यादातर शूटिंग बनारस में हुई थी और 2003 में नैनीताल के अशोक टॉकीज में इसे दिखाया गया. गिर्दा खुद चौथे दिन इसे देखने आए. इसके अलावा बेला नेगी की फिल्म ‘दायें या बाएं’ में भी गिर्दा ने महत्वपूर्ण किरदार निभाया.

गिर्दा  ने स्वयं तो लोक संस्कृति को सँजोने में योगदान दिया ही, साथ ही कई सारे लोक कलाकारों को खोजकर उन्हें समाज के सामने लाने का श्रेय भी उनको जाता है. रमोल गायक हरदा सूरदास और भड़ौ गायक झूसीया दमाई ऐसे ही कलाकार थे जिन्होंने सार्वजनिक मंच पर आने के बाद अपनी विशिष्ट गायन शैली से लोगों के दिलों में राज किया. झूसीया दमाई पर तो उन्होंने 400 पेज का एक शोध भी लिखा था. 1994 में गिर्दा ने हरदा सूरदास से अपनी पहली मुलाकात कुछ इस तरह से लिखी थी:

‘बात कुछ साल पुरानी होगी. संभवतः 1980-81 की. मई-जून का महीना. नैनीताल टूरिस्टों से खचाखच भर हुआ. शहर की माल रोड मोटर कारों से त्रस्त. ऐसे वातावरण में स्टेट बैंक मल्लीताल के पास मेरे कान में अचानक पहाड़ी हुड़के की गमक के साथ नेपाली मिक्स पहाड़ी गीत गाती एक सुरीली आवाज पड़ी. मैंने चौंक कर इधर उधर देखा तो सड़क किनारे पेड़ की छाया में बैठ एक ‘सूरदास’ हुड़का बजाता, गीत गाता दिखाई दिया. गीत की स्थायी आज भी मुझे याद है:

‘गोपुली फुलयों ही हिमाल हवा ले,
मैं तो फुली भीना ज्यू तिमरी माया ले.’

गीत पूरा होने पर उस अंधे गायक ने सामने बिछे कपड़े को हाथ से टटोला और वह रेजगारी समेटी जिसे आते जाते लोग कृपापूर्वक उस कपड़े में डाल गए थे”।

कवि सम्मेलनों के अलावा गिर्दा और प्रसिद्ध लोक गायक नरेंद्र सिंह नेगी की जुगलबंदी भी लोगों के बीच काफी लोकप्रिय रही. उनकी जुगलबंदी ने न सिर्फ उत्तराखंड और भारत बल्कि अमेरिका में भी काफी धूम मचाई. साल 2007 में Uttaranchal association of north America ने अपने सालाना कार्यक्रम में न्यूजर्सी, न्यूयॉर्क, कॉर्नेल यूनिवर्सिटी और न्यू हेम्पशायर में शेखर पाठक, गिर्दा और नरेंद्र सिंह नेगी की जुगलबंदी के कार्यक्रम करवाए. गिर्दा के साथ अपनी जुगलबंदी को याद करते हुए नरेंद्र सिंह नेगी लिखते हैं कि, ‘सर्वप्रथम 1999 में गढ़वाल सांस्कृतिक मंच पौड़ी ने राजू रावत की सलाह पर हम दोनो की जुगलबंदी का एक प्रयोग किया, जिसकी सफलता के बाद पहाड़ ने नैनीताल में, ईप्टा ने देहरादून में, चंदन दाँगी ने दिल्ली में कार्यक्रम करवाए. शेखर पाठक ने हमे ‘ज्योंला मुरुली’ का नाम दिया था. शेखर दा, चंदन दाँगी और हमने गिर्दा  के गीतों की स्टूडियो रिकॉर्डिंग की योजना बनाई थी. जीवन भर केसेट बाजार से हमेशा दूर रहने वाले गिर्दा को किसी तरह से मनाया गया और वो राजी भी हो गए थे. अक्टूबर 2010 में हिमालयन फिल्म् कंपनी देहरादून में रिकॉर्डिंग तय थी किन्तु हुमने देर कर दी. हम योजना बनाते रह गए और वह अपने गंतव्य को चला गया.’

नरेंद्र सिंह नेगी और शेखर पाठक ने बारामासा से बात करते हुए गिर्दा से जुड़ी अपनी जो यादें साझा की हैं, उन्हें पर डिस्क्रिप्शन में दिए गए लिंक पर जाकर देख सकते हैं. गिर्दा के तमाम गीत और कविताएँ वक्त के साथ-साथ और भी प्रासांगिक प्रतीत होती हैं. उनकी ऐसी रचनाओं की लम्बी फ़ेहरिस्त हैं जिसमें. ‘बोल ब्योपारि तब क्या होगा’, ‘पानी बीच मीन पियासी’, ‘उत्तराखंड मेरी मातृभूमि’, ‘हम लड़्ते रुंल’, ‘आज हिमालय’ जैसी कई रचनाएँ शामिल हैं.

गिर्दा ने बच्चों के लिए भी कविता करते हुए लिखा था:

जहां न बसता कंधा तोड़े, ऐसा हो स्कूल हमारा
जहां न पटरी माथा फोड़े, ऐसा हो स्कूल हमारा
जहां न अक्षर कान उखड़े, ऐसा हो स्कूल हमारा
जहां किताबें निर्भय बोलें, ऐसा हो स्कूल हमारा
मन के पन्ने पन्ने खोलें, ऐसा हो स्कूल हमारा
जहां बालपन जी भर चहके, ऐसा हो स्कूल हमारा

लगभग 40-50 साल लिखने के बाद भी गिर्दा का ध्यान अपने ज्यादातर गीतों के प्रकाशन पर नहीं गया. वो आंदोलनों में सक्रिय रूप से भागीदार रहे और उनका ध्यान अपने गीतों के माध्यम से लोगों को जागृत करने में ही लगा रहा.

22 अगस्त 2010 को गिर्दा इस जीवन को अलविदा कह गए. जीवित रहते हुए तो उन्होंने समाज की कई भ्रांतियाँ तोड़ी ही, लेकिन मौत के बाद भी वो समाज को बदलते रहे. उन्होंने कभी जिक्र किया था कि ‘मेरी अंतिम यात्रा में महिलायें भी होंगी’ और ऐसा ही हुआ भी. पूरा शहर ही उनके अंतिम दर्शन करने उमड़ पड़ा था और उनके लिखे गीत गाते हुए उन्हें अंतिम विदाई दी गई.

उनकी स्मृति में शेखर पाठक ने लिखा है कि ‘यों तो सब यही कहते हैं कि 22 अगस्त 2010 को गिर्दा तुम इस असार और परिवर्तनशील संसार से चले गए थे. पर हमें आज भी यही लगता है कि तुम अभी भी यहीं हो. यहीं रहोगे. अंत तक. किसके अंत तक? हमारी सामाजिक-सांस्कृतिक स्मृति के, जो हमारे बाद भी बनी रहेगी…’

स्क्रिप्ट: गौरव नेगी