हिमालय के खस

  • 2022
  • 15:53

खस्या, एक ऐसा शब्द जो पहाड़ों में या तो दबे-छिपे बोला जाता है या राजपूतों को छेड़ने-चिढ़ाने के लिए इस्तेमाल होता है. अक्सर राजपूत लोग ख़ुद को खस्या बुलाए जाने पर बिदक भी जाते हैं. लेकिन क्या वाक़ई खस्या एक अपमानजनक शब्द है?

ये शब्द कहाँ से आया, दुनिया में कहाँ-कहाँ इस शब्द का प्रयोग होता है और आखिर कौन होते हैं खस्या? इन सभी मुद्दों पर आज तफ़सील से बात करेंगे.

खस्या शब्द न तो अपमानजनक है और न ही सिर्फ़ उत्तराखंड तक सीमित है. ये शब्द एक ऐसे मानव समूह के लिए इस्तेमाल होता रहा है कि जिसकी कर्मठता के क़िस्से दुनिया के कई कोनों में सुनाई देते हैं. एक ऐसा मानव समूह जो हजारों साल पहले उत्तराखंड भी आया और फिर यहीं का होकर रह गया. आपको ये जानकार हैरानी हो सकती है कि आज के उत्तराखंड में न सिर्फ़ राजपूत बल्कि नब्बे फ़ीसदी ब्राह्मण जातियां भी इसी मानव समूह से निकली हैं. जी हाँ, पहाड़ों के नब्बे प्रतिशत ब्राह्मण भी असल में खस्या ही हैं.

ये तथ्य अगर आपको हैरान कर रह हैं तो चलिए आपको खसों के मूल इतिहास की ओर ले चलते हैं. हिमालय से हजारों किलोमीटर दूर सेंट्रल एशिया में दुनिया की सबसे बड़ी झील है. इसे कैस्पियन सी या कैस्पियन सागर भी कहा जाता है. यहीं से काकेशस पर्वत शृंखला का विस्तार भी शुरू होता है जो ब्लैक सी तक फैलता है. माना जाता है कि खस नस्ल के लोग मूलतः इसी पर्वत शृंखला से निकले.

प्रो॰ डीडी शर्मा अपनी किताब ‘हिमालय के खश’ में लिखते हैं, ‘कॉकेशस पर्वतों में रहने वाले लोग ही खश कहलाए जिन्हें मूलतः कस्सी कहा जाता था. बल्कि इन्हीं लोगों के कारण कैस्पियन सागर को भी अपना नाम मिला जिसे अरबी भाषा में ‘बहरे खश’ या खश सागर कहा जाता है.’

कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार इस इलाके में हजारों साल पहले एक बड़ा भूकंप आया था. इसमें हजारों लोगों की मौत हुई और बाक़ी बचे लोगों ने तेजी से पलायन करना शुरू किया. यही लोग फिर मध्य एशिया होते हुए भारत भी पहुँचे और खस कहलाए.

प्रो॰ डीडी शर्मा के साथ ही देश और दुनिया के कई शोधकर्ताओं और इतिहासकारों ने खसों को मूलतः कॉकेशस का ही वासी बताया है. साल 1828 में रिट्ज़ हेबर, 1868 में वाटसन, 1884 में एटकिंसन और 1929 में प्रो एलडी जोशी ने भी खसों पर शोध किए. इन सभी इतिहासकारों और वैज्ञानिकों ने खसों का संबंध कॉकेशस पर्वतों में रहने वाले कस्सी या कस्साइत मानव समूह से माना है. इसी मानव समूह को समय के साथ-साथ केस, खेस, खश, खस, और खस्या कहा जाने लगा.

इतिहासकार ट्रैबो के अनुसार पूर्व पाषाण काल के अंत में खस मानव समूह की एक शाखा काकेशस से अनातोलिया की ओर चलते हुए मध्य यूरोप में दाखिल हुई और वहीं बस गई. इसकी दूसरी शाखा सीरिया और फ़िलिस्तीन होते हुए अफ़्रीका पहुंची जहां उन्होंने नील नदी के पास कुश साम्राज्य की बुनियाद रखी. और इसकी तीसरी शाखा पहाड़ी रास्तों से तुर्की, ईरान और इराक़ होते हुए कुर्दिस्तान में जा बसी. इसी शाखा के लोग आगे चलकर अफगानिस्तान, आज के पाकिस्तान और कश्मीर होते हुए हिमालयी राज्यों में पहुँचे.

कुछ ऐसी ही यात्रा आर्यों की भी रही है. तो क्या ये कहा जा सकता है कि आर्य और खस एक ही हैं? खसों पर विस्तृत शोध करने वाले एलडी जोशी के अनुसार खश आर्यों का ही एक उपवर्ग है. हालाँकि ये कह पाना कठिन है कि मध्य हिमालय में खस, वैदिक आर्यों से पहले आए या बाद में. लेकिन ये तय है कि आदि गुरु शंकराचार्य के संपर्क में आर्य पहले आए लिहाज़ा उन्होंने हिंदू शास्त्रों को पहले अपनाया. जबकि खसों ने लंबे समय तक जातीय व्यवस्था की मुख़ालिफ़त की.  

आर्यों पर शोध करने वाले अधिकतर विद्वान और एंथ्रोपोलॉजिस्ट मानते हैं कि मौलिक आर्यजाति के दो दल थे. एक को उन्होंने ‘सेफैलिक’ कहा और दूसरे को ‘दसेफैलिक’. ‘सेफैलिक’ वो हुए जिन्होंने एक स्थिर, स्थायी और व्यवस्थित जीवनशैली अपनाकर धार्मिक अनुष्ठान और सामाजिक व्यवस्थाओं का पालन किया. जबकि ‘दसेफैलिक’ वो हुए जिन्होंने प्रकृति के अनुरूप ही एक स्वच्छंद जीवनशैली चुनी. भारतीय संदर्भ की बात करें तो ‘सेफैलिक’ हुए वैदिक आर्य और ‘दसेफैलिक’ हुए खस.

खसों को आर्यों का ही वंशज मानने का एक प्रमाण डीडी शर्मा अपनी किताब ‘हिमालय के खश’ में भी देते हैं. वो लिखते हैं, ‘इसका एक प्रमाण ये भी है कि सदियों तक एक-दूसरे से अलग रहने के बाद भी जब ये करीब आए तो बेहद सहजता से घुल-मिल गए. प्रागैतिहासिक काल में भी इन दोनों ने हिमालयी क्षेत्रों में संगठित होकर नागों, कोलों, और किरातों से संघर्ष किया और उन्हें हराकर उनके क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया.’

भाषाई आधार भी यही संकेत देते हैं कि खस और वैदिक आर्य एक ही मूल के थे क्योंकि इन दोनों की मातृभाषा एक ही थी. ‘हिमालय के खश’ किताब में जिक्र मिलता है, ‘भाषा पर हुए अनुसंधानों से यह स्पष्ट हो गया है कि खशों की कस्साइत भाषा और वैदिक आर्यों की संस्कृत एक ही गर्भ से निकली हुई सगी बहनों जैसी हैं. पाणिनि, कात्यायन, पतंजलि और नाट्यशास्त्र के रचयिता भरत मुनि ने संस्कृत की जिस विभाषा को ‘उदीचाम’ नाम दिया है वह इन्हीं खशों की भाषा थी.’

उत्तराखंड के संदर्भ में तो ये जानकारी और भी ज़्यादा दिलचस्प हो जाती है. तारादत्त गैरोला, एडविन एटकिंसन और एलडी जोशी जैसे विद्वानों का हवाला देते हुए प्रो देवी दत्त शर्मा लिखते हैं कि इस प्रदेश में रहने वाले ब्राह्मणों की भी लगभग 90 प्रतिशत आबादी, असल में खशों की ही वंशज है. यानी इन लेखकों और इतिहासकारों के अनुसार उत्तराखंड की अधिसंख्य अगड़ी जातियाँ, खस्या हैं.

ये तो हुई खस समुदाय के मूल और उनके हिमालयी क्षेत्रों में बसने की कहानी. अब बात करते हैं खसों के सबसे अहम पहलू पर. इस पहलू पर कि यहां बसने के बाद उन्होंने हिमालयी राज्यों को क्या-क्या दिया. डॉ. डीडी शर्मा की मानें तो ‘आज अधिकतर हिमालयी क्षेत्रों में जो कुछ भी, जिस किसी रूप में भी उपलब्ध है वह सब इन खशों के श्रम और प्रयास का ही फल है.

इतिहासकार डॉ. शिव प्रसाद डबराल थोड़ा और विस्तार में जाते हुए अपनी किताब ‘खशों के पद चिन्ह’ में लिखते हैं, ‘इन प्रदेशों में रहते हुए खशों ने यहां की वनस्पतियों, पेड़-पौधों की उपयोगिता का पता लगाया. यहां पैदा होने वाली हजारों जड़ी-बूटियों का नामकरण किया. उनकी लाभदायक और हानिकारक विशेषताओं को चिह्नित किया. बनैले पशुओं, भेड़-बकरियों, कुत्तों, घोड़ों, गधों को पालतू बनाया. जानवरों के लिए उपयोगी घास वाले पेड़ों, जंगली फलदार वृक्षों को अपने और अपने जानवरों के लिए उगाया और उनका पोषण किया.’  

पहाड़ी इलाकों में कश्मीर से लेकर हिमाचल, उत्तराखंड और नेपाल तक जो सीढ़ी-दार खेत आपको नजर आते हैं, ये सब खसों की ही देन है. कल्पना कीजिए पहाड़ी ढलानों को काट-काट कर उन्हें खेती लायक़ बनाने की यह कितनी विशाल परियोजना रही योगी जिसे खसों ने पूरा कर दिखाया.

सिर्फ़ खेत ही नहीं बल्कि नदी-नालों से खेतों तक नहर बनाने का काम भी खशों ने ही किया जिसकी बदौलत आज भी हिमालय के राज्य अपने पैरों पर खड़े है. ‘हिमलाय के खश’ में लिखा गया है कि ‘अपने जानवरों के साथ पर्वतों की पीठ पर चलते हुए खशों ने जो पदचिह्न बनाए, उन्हीं से पहाड़ों के आरंभिक मार्ग बने. खशों ने दलदलों पर डंडे रखकर, हिमानियों पर मिट्टी फेंक कर, महानदियों को खालों की डोंगी से और रस्सियों के झूलों से पार करके जिन रोचक विधियों का अविष्कार किया, उन्हीं के सहारे पिछले हजारों सालों से तमाम जातियाँ, शरणार्थी टोलियाँ, विजेताओं की सेनाएँ, व्यापारियों के क़ाफ़िले, चोर-डाकुओं के दल, साधु-संत, यात्री और घुमक्कडों की पंक्तियाँ चली आ रही हैं.’

खस लोग पहाड़ों के सबसे पहले रहवासी नहीं थे. नाग, कोल और किरात उनसे पुराने रहवासी रहे हैं. लेकिन पहाड़ों को खेती लायक़ बनाने और आधुनिक जीवनशैली से जोड़ने का श्रेय खसों को ही जाता है. जानवरों को पालतू बनाने का काम भी पहले-पहल उन्होंने ही किया और गाय की उपयोगिता को समझते हुए उसकी पूजा करने की परम्परा भी खसों ने ही शुरू की. 

अमेरिकन इतिहासकार जेम्स फोर्ड रोड्स की किताब ‘हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया’ का हवाला देते हुए डॉ. शिव प्रसाद डबराल लिखते हैं कि गाय को पूज्य ठहराने के पीछे खशों का ही योगदान है. खश लोग गाय को मातृ-देवी ह्योर का प्रतिनिधि मानते थे. वे गाय के प्रति अपनी इसी पूज्य भावना को लेकर भारत में दाखिल हुए थे. बाद में अन्य जातियों और समुदायों ने भी उनका अनुकरण किया और गाय को पूजने की परंपरा विस्तृत हुई.

खश समुदाय में छुआ-छूत जैसी कु-प्रथा या जाति व्यवस्था नहीं थी लेकिन ये लोग उन समुदायों से दूरी जरूर बनाए रखते थे जो गाय का मांस खाते थे. डॉ. डबराल के अनुसार वैदिक आर्यों में भी सम्भवतः गाय की पूजा करने की परम्परा खशों के प्रभाव से ही आई.

क्या खश केवल गाय की ही पूजा करते थे या उनका कोई भगवान भी था? भगवान की बात हम इसलिये भी कर रहे हैं, क्योंकि वैदिक आर्यों के प्रभाव में खश कई सालों बाद आए. ऐसे में ये जानना दिलचस्प है कि हिंदू धर्म में शामिल होने से पहले, खस किसकी पूजा किया करते थे?

प्रो डीडी शर्मा अपनी किताब में लिखते हैं कि उत्तराखंड, हिमाचल और कश्मीर में बसे खसों के देवी-देवता लगभग एक समान थे. कॉकेशस श्रंखलाओं से हिमालय तक पहुंचने की उनकी यात्राओं में वो कई देवी देवताओं को मानने लगे थे. इनमें एक देवता था कशू. कालांतर में यही कशू देवता ‘महासू’ के रूप में पूजा जाने लगा जिसके मंदिर हिमाचल, उत्तराखंड और नेपाल में भी मिलते हैं. हिमाचल में तो एक पूरे जिले को ही महासू का नाम दिया गया था. इस जिले को एक सितंबर 1972 को खत्म कर शिमला और सोलन जिले का पुनर्गठन किया गया. 

हिमलाय के खश में इस संदर्भ में लिखा गया है, ‘नाग मानव समूह के इष्टदेव शिव थे. नागों को हराने के बाद जब खशों ने उनकी महिलाओं से विवाह किया तो नागवंशीय पत्नियों के माध्यम से शिव और महासू का मूल-भेद दृष्टि से ओझल हो गया और दोनों को एक ही माने जाने लगा. क्योंकि महासू का मतलब भी महान देवता या महादेव ही होता है. अतः भाषा के आधार पर महासू, महादेव तथा महेश्वर को एक ही माना जाने लगा. लेकिन व्यावहारिक स्तर पर देखा जाए तो इन दोनों की संकल्पना और आराधना पद्धति में मूलभूत अंतर है. मसलन, महासू देवता के साथ शिवरात्रि जैसा कोई विशेष त्यौहार नियत नहीं है. दूसरा, महासू नियत रूप से बलिभोजी देवशक्ति है. यानी उसके मंदिर में पशु बलि दी जाती है. जबकि शिव भगवान के लिये पशु की बली देने की प्रथा कभी नहीं रही. महासू देवता के समान ही शिव का एक अन्य रूप, जो कि खशों का आराध्य रहा है वो है बैजनाथ. इसके प्रख्यात मंदिर खश-प्रधान क्षेत्रों मसलन हिमाचल के कांगड़ा, उत्तराखंड के बैजनाथ-कत्यूर और नेपाल में भी मौजूद हैं.’

हजारों साल पहले जो खस उत्तराखंड और अन्य हिमालयी राज्यों में रटे थे, उनकी मौजूदगी के कुछ स्पष्ट प्रमाण उनके शवगृह और क़ब्रों से भी मिलते हैं. इन्हें मेगलिथिक शवगृह कहा जाता है. 19 वीं सदी के इंग्लैंड के इतिहासकार जेडब्ल्यू व्हीलर के अनुसार, ये शवगृह अल्मोड़ा के देवीधूरा से लेकर पश्चिम में लेह-लद्दाख तक पाए जाते हैं. लाहौल-स्पीति, चंबा, किन्नौर, कुमाउं के द्वाराहाट, बैजनाथ और बागेश्वर में सबसे ज्यादा मिलते हैं. कुमाउं क्षेत्र में ये शवगृह रामगंगा की घाटी में नौला और जैनल में भी मिले हैं.

जाते-जाते आपको खसों से जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें और बताते हैं. पहली तो ये कि आज भी उत्तराखंड में जो आंचलिक त्योहार खूब धूम-धाम से मनाए जाते हैं, उनमें में अधिकतर खसों के ही त्योहार हैं. मसलन हरियाली जिसे हरेला भी कहा जाता है, बगवाली, बूढ़ी दिवाली, उत्तरैणी, फूलदेई, भुण्डा आदि.. ये सब खशों के ही त्यौहार हैं.

अब जब खसों के इतिहास के बारे में आप इतना कुछ जान गए हैं तो एक अंत में दिलचस्प कहानी आपको और सुनाते हैं. ये कहानी तब की है जब दूसरा विश्व युद्ध शुरू होने में कुछ ही समय बचा था और हिटलर ‘प्योर ब्लड’ यानी ‘सबसे शुद्ध रक्त’ के मूल को खोजने की सनक में था. 

‘हिटलर एंड इंडिया: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ हिज हेट्रेड फॉर द कंट्री एंड इट्स पीपल’ के लेखक वैभव पुरंदरे ने इस सम्बंध में एक लेख लिखा है जो बीबीसी हिंदी में प्रकाशित हुआ है. इस लेख में बताया गया है कि दूसरा विश्व युद्ध शुरू होने से एक साल पहले जर्मन लोगों का एक समूह चुपके-से भारत की पूरी सीमाओं पर पहुंचा. इस समूह का उद्देश्य था ‘आर्य जाति की उत्पत्ति का स्रोत’ खोजना.

अडॉल्फ हिटलर का मानना था कि ‘आर्य’ नॉर्डिक लोग लगभग डेढ़ हज़ार साल पहले उत्तर दिशा से भारत आए थे. लेकिन यहाँ आकर वे स्थानीय ‘अनार्यों’ से घुल-मिल गए लिहाज़ा पृथ्वी की सबसे श्रेष्ठ नस्ल होने के गुण उन्होंने खो दिए. फिर भी अगर मेहनत की जाए उस श्रेष्ठ नस्ल के कुछ लोग खोजे जा सकते हैं. 

हिटलर के अनुयायी ‘गोरा नॉर्डिक श्रेष्ठ जाति’ का विचार रखते हुए शपथ लेते थे. ये लोग एक खोए हुए काल्पनिक शहर अटलांटिस की कहानी में यकीन रखते थे जहां कभी ‘सबसे शुद्ध रक्त’ के लोग रहा करते थे. माना जाता है कि यह शहर अटलांटिक महासागर में इंग्लैंड और पुर्तगाल के बीच कहीं स्थित था. कहते हैं कि ये पौराणिक द्वीप एक दिन दिव्य वज्रपात की चपेट में आने के बाद डूब गया.

माना जाता है कि वहां से बचने वाले सभी आर्य सुरक्षित स्थानों पर चले गए. हिमालय और ख़ास तौर से तिब्बत को उनकी सुरक्षित शरणस्थली माना जाता था, क्योंकि ये ‘दुनिया की छत’ के रूप में मशहूर है.

हिटलर के आदेश पर उसके सलाहकार और सैन्य कमांडर हेनरिक हिमलर ने 1935 में, एक यूनिट बनाई, जिसे अहननेरबे या पैतृक विरासत ब्यूरो कहा जाता था. इस ब्यूरो का काम ये पता लगाने का था कि अटलांटिस शहर के लोग बिजली गिरने और प्रलय होने के बाद आख़िर कहां गए? लिहाज़ा उस जगह की खोज की जाए जहां महान आर्य जाति के निशान अभी भी बने हुए हैं. इसी खोज में 1938 में हिटलर ने पांच जर्मनों की एक टीम को भारत होते हुए तिब्बत भेजा गया. इन्हें यहां के लोगों और ख़ास तौर से खसों की नस्ल परखने का काम मिला था. 

ये जांच टीम लोगों की खोपड़ी और उनके चेहरे का माप लेती और फेसमास्क बनाती. इनका ये काम चल ही रहा था कि दूसरा विश्व युद्ध छिड़ गया और इस टीम को जर्मनी लौटना पड़ा. हालाँकि तब तक इस टीम ने 376 तिब्बतियों की खोपड़ी और अन्य विशेषताओं को माप लिया था. उनकी क़रीब दो हज़ार तस्वीरें, चेहरों, हाथों और कानों की नक़ल और क़रीब 350 लोगों की उंगलियों और हाथों के निशान ये टीम जमा कर चुकी थी. 

तिब्बत से लाई गई इस ‘शोध सामग्री’ को साल्ज़बर्ग के एक महल में रखा गया. लेकिन 1945 में मित्र देशों की सेना ने वहां छापा मारा जिसमें अधिकांश तिब्बती चित्र और अन्य सामग्रियां बर्बाद हो गईं. फिर नाज़ियों के अतीत की शर्म के चलते युद्ध थमने के बाद भी किसी ने उन सामग्रियों का पता लगाने की कभी कोशिश नहीं की.

हिमलाय के खसों में ‘सबसे शुद्ध रक्त’ खोजने की सनक हिलटर की मौत के साथ ही समाप्त हो गई. 

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