कुली बेगार आन्दोलन

  • 2023
  • 16:56

14 जनवरी 1921. मकर संक्रांति का दिन था. दोपहर के करीब डेढ़ बज रहे थे. कुमाऊं स्थित बागेश्वर में सरयू नदी के किनारे हज़ारों लोग उत्तरायणी मेले में शरीक होने पहुंचे थे. सरयू और गोमती नदी के संगम पर बसी ये जगह सरयूबगड़ के नाम से भी जानी जाती है. इसी जगह कुमाऊं परिषद के कुछ नेता करीब 10 हजार लोगों की एक विशाल जनसभा को संबोधित कर रहे थे. कुमाऊं परिषद् के ये नेता कुछ ही दिन पहले अपने 50 से ज़्यादा कार्यकर्ताओं के साथ बागेश्वर पहुंचे थे. इनमें बद्रीदत्त पाण्डे, हरगोविन्द पंत और चिरंजीलाल साह जैसे नाम शामिल थे.

ये जनसभा कुली बेगार के विरोध में हो रही थी, जहां कई नेता भाषण देते हुए कुली बेगार के खिलाफ हुंकार भर रहे थे. जब बद्रीदत्त पाण्डे की बारी आई तो उन्होंने जोशीले अंदाज़ में बागनाथ मंदिर की शपथ लेकर कुली बेगार को कभी न मानने का आह्वाहन किया. कुछ देर तक तो हजारों की इस भीड़ के बीच सन्नाटा पसर गया लेकिन जल्द ही सभी लोगों ने सामूहिक स्वर में शपथ लेते हुए कहा – हम कुली नहीं बनेंगे. इसके साथ ही मालगुजारों ने अपने-अपने गांवों के कुली रजिस्टरों को सरयू नदी में फेंकना शुरू कर दिया. देखते ही देखते सारे रजिस्टर सरयू नदी के प्रवाह में बहा दिए गए.

इस घटना को देखकर अंग्रेज अधिकारियों के होश फ़ाख़्ता हो गए. उन्होंने जनता के इस विद्रोह को काबू करने की कोशिश की मगर हज़ारों लोगों के इस आक्रामक प्रतिरोध को देखते हुए अंग्रेज विफल रहे. इसी ऐतिहासिक घटना के साथ उत्तराखण्ड में व्याप्त सैकड़ों साल पुरानी कुप्रथा कुली बेगार का अंत हुआ. उत्तराखण्ड के इतिहास में इस घटना को ‘रक्तहीन क्रांति’ के नाम से जाना जाता है.

ये दौर आज़ादी से पहले का था. उन्नीसवीं सदी का दूसरा दशक. साल 1815. अंग्रेजों ने गोरखाओं को हराकर उत्तराखण्ड में टिहरी रियासत को छोड़, बाक़ी हिस्से पर अपना अधिकार जमा लिया था. इसके साथ ही उन्होंने अपनी सुविधानुसार इस क्षेत्र को प्रशासनिक इकाइयों में बांटना भी शुरू किया. साल 1839 में कुमाऊं कमिश्नरी को दो भागों कुमाऊं और गढ़वाल में विभाजित कर दिया गया, जिसे ब्रिटिश कुमाऊं और ब्रिटिश गढ़वाल कहा गया.
एक ओर टिहरी में राजशाही और दूसरी ओर बाक़ी हिस्से पर अंग्रेजों का शासन. पहाड़ की जनता दोनों के ही शासन में अनेक समस्याओं से त्रस्त थी. कई दमनकारी नीतियों का बोझ जनता पर लाद दिया गया था. इनमें कुली बेगार, कुली उतार और कुली बर्दायश भी शामिल थे, जिसे सम्मिलित रूप से कुली बेगार प्रथा कहा जाता था.

यूं तो पर्वतीय जनता को दास बनाकर उनसे जबरन कार्य करवाना चन्द वंश और गोरखाओं के शासनकाल या संभवत: उनसे भी पहले से चला आ रहा था. मगर उस दौरान विरोध का कोई मजबूत स्वर उभरकर सामने नहीं आया. ज़ाहिर तौर पर इसका कारण उस वक्त शिक्षा का अभाव रहा होगा. इस वजह से ‘प्रभुसेवा’ के नाम पर कुली बेगार देना ही पड़ता था. प्रतिरोध की जो कुछेक घटनाएं सामने आईं भी तो उन्हें गंभीरता से नहीं लिया गया. जनता ने इन अत्याचारों को सहते रहना ही अपनी नियति समझ लिया था. मगर हर बुराई का अंत ज़रूर होता है. इस कुप्रथा का भी हुआ.

शुरूआत में जब अंग्रेज यहां आए तो सड़कों और पक्के रास्तों का अभाव था. कई सारे ज़िलों में, तहसीलों में, ब्लॉक मुख्यालयों में और कुछ गांवों में भी अंग्रेज अधिकारियों के प्रशासनिक कार्यालय होते थे. ऐसे में चढ़ाई और ढ़लान वाले उबड़खाबड़-पथरीले लम्बे-लम्बे रास्तों से पैदल आना-जाना उनके लिए काफी मुश्किलों भरा था. इसके अलावा 1858 में जब उत्तराखंड का शासन ईस्ट इंडिया कंपनी से ब्रिटिश क्राउन के हाथों में आया, तो वन बंदोबस्त की प्रक्रियाएं शुरू हुईं. जनता के जंगलों को लेकर उनके अधिकार सीमित कर दिए गए. रेलवे लाइनें बिछने लगीं, लिहाज़ा जंगलों से पेड़ों का कटान होने लगा. जगह-जगह शोध एवं सर्वे के कार्य होने लगे. ऐसे में कुलियों की मांग भी बढ़ने लगी. और अपनी इन तमाम दुविधाओं का हल अंग्रेजों ने कुली बेगार प्रथा के रूप में निकाला.

आगे बढ़ने से पहले समझ लेते हैं कि कुली बेगार प्रथा आख़िर थी क्या?
कुली बेगार के तहत स्थानीय लोगों से अंग्रेज अधिकारी मुफ़्त में काम करवाते थे. इस काम का उन्हें कोई भुगतान नहीं किया जाता था. कुली बेगार के साथ दो अन्य प्रथाएँ भी शामिल थीं. एक कुली उतार और दूसरी कुली बर्दायश.
कुली उतार के तहत कुलियों को उनके श्रम की तुलना में बेहद कम मजदूरी दी जाती थी. वहीं कुली बर्दायश प्रथा के अन्तर्गत जब अंग्रेज अधिकारी, उनके कोई रिश्तेदार या मित्र आते तो वहां के स्थानीयों को उन्हें मुफ़्त में राशन, खाने-पीने का सामान, ईंधन और कई बार ठहरने की व्यवस्था भी उपलब्ध करानी होती थी.

कई गांवों के प्रधान और पटवारियों की ये ज़िम्मेदारी होती थी कि कुछ निश्चित दिनों के लिए निश्चित कुलियों की व्यवस्था अंग्रेजों के लिए उपलब्ध करवाएं. कुलियों के इस ब्यौरे के लिए बकायदा एक रजिस्टर होता था, जिसे कुली रजिस्टर कहा जाता था.

कुली बेगार को खत्म करने के कई बार प्रयास भी हुए मगर ये सभी प्रयास विफल रहे. 1816 में जब विलियम ट्रेल कुमाऊं कमिश्नर नियुक्त हुए, तो उन्होंने भी कत्यूरी, चन्दों और गोरखाओं के शासनकाल से चली आ रही इस प्रथा को समाप्त करने की कोशिश की. इसके लिए 1822 में खच्चर सेना का प्रस्ताव रखा गया. फिर 1823 में ‘खच्चर सेना’ का निर्माण हुआ ताकि खच्चरों की मदद से अंग्रेज अधिकारियों का सामान ढोया जा सके और स्थानीय ग्रामीणों की मुश्किलें कुछ कम हो सकें. मगर खच्चर सेना ज्यादा वक्त तक प्रभावी नहीं रह सकी और फिर से ग्रामीणों से कुली बेगार ली जाने लगी.

1860 का दशक खत्म होते-होते इस कुप्रथा को और भी मजबूत स्वरूप मिलने लगा. ये वो दौर था जब संयुक्त प्रान्त के लेफ्टिनेंट गवर्नर विलियम म्यूर हुआ करते थे. साल 1869 में उन्होंने उत्तराखण्ड की कानूनी व्यवस्थाओं की समीक्षा के लिए एक आयुक्त की नियुक्ति की. इनका नाम था पी वेली. अपनी रिपोर्ट में उन्होंने उत्तराखण्ड यानी ब्रिटिश कुमाऊं और गढ़वाल को नॉन रेग्यूलेटिंग क्षेत्र से हटाने की मांग की. इसके बाद 1874 में उत्तराखण्ड में शेड्यूल डिस्ट्रिक्ट एक्ट पारित कर दिया गया. इस एक्ट के तहत तत्कालीन कुमाऊं कमिश्नर हैनरी रैमजे के कार्यकाल में यहां कुली बेगार को कानूनी मान्यता दे दी गई.

कुली बेगार, कुली उतार और कुली बर्दायश के बारे में ब्रिटिश सरकार ने ‘द रेग्यूलेशन ऑफ द गर्वनमेंट ऑफ फोर्ट विलियम, खण्ड-2’ में लिखा है – “जब ब्रिटिश अधिकारी पर्वतीय क्षेत्र में दौरे पर आएं तो स्थानीय जनता के लिए अनिवार्य होगा कि वे उनके लिए नि:शुल्क कुलियों की व्यवस्था करें. इस प्रथा को कुली उतार कहा जाएगा. यह व्यवस्था न केवल अधिकारियों के लिए होगी बल्कि उनके साथियों एवं कर्मचारियों के लिए भी होगी. इसके अलावा इस सुविधा का लाभ ब्रिटिश पर्यटकों को भी मिलेगा.”

मासूम पहाड़ियों के साथ इस तरह का अपमानजनक व्यवहार बेहद निंदनीय था. कई वर्षों तक ये सब चलता रहा. मगर धीरे-धीरे वक्त ने करवट ली और पहाड़ी लोगों के खून में उबाल आना शुरू हुआ. एक के बाद एक ऐसी कई घटनाएं होने लगी जहां लोगों ने इस कुप्रथा के ख़िलाफ़ बग़ावत शुरू की. कहीं अंग्रेजों का आदेश मानने से इनकार किया जाने लगा, कहीं निर्माण के लिए पत्थरों की उपलब्धता रोक दी गई, कहीं खाने-पीने की व्यवस्था करने से इनकार कर दिया गया तो कहीं कुलियों की उपलब्धता बंद कर दी गई. ये मुद्दा लगातार व्यापक होता गया और 1893 में लाहौर में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में बेगार के विरोध में प्रस्ताव पारित किया गया. फिर साल 1894 में प्रांतीय काउंसिल में  भी कुली बेगार का मुद्दा गर्माया रहा.

इन छोटी-छोटी और ज़रूरी पहलों का प्रतिफल ये रहा कि साल 1907 में सरकार ने घोषणा की कि भविष्य में बेगार और बर्दायश का मूल्य दिया जाएगा. हालाँकि ये बात भी हवाई ही रही और धरातल पर इस पर कोई अमल नहीं हुआ. कुली बेगार को ख़त्म करने की राह में प्रमुख पड़ाव रहा, साल 1908 में गढ़वाल में कुली एजेन्सियों की स्थापना. पौड़ी गढ़वाल के तहसीलदार जोध सिंह नेगी ने कुली बेगार से परेशान ग्रामीणों की समस्याओं को कुछ कम करने की दिशा में एक प्रयत्न किया. जोध सिंह नेगी ने डिप्टी कमिश्नर के दौरे पर अपनी अस्वालस्यूं पट्टी के प्रत्येक परिवार से एक रूपया लेकर अदवाणी में कुलियों की व्यवस्था कर दी. अदवाणी में ये तरीका कारगर रहा. ऐसे में इसे पूरे जिले में लागू किया गया. कुली कर की राशि से कुछ कुली स्थायी रूप से निश्चित मासिक वेतन पर काम करने लगे. कोटद्वार, पौड़ी, बांघाट, श्रीनगर, दुगड्डा और लैंसडाउन जैसी अन्य जगहों में कुली एजेन्सियों में कुछ खच्चर भी रखे गए जो अंग्रेज अधिकारियों का सामान वहन करते थे. इस कुली एजेन्सी को ‘ट्रांसपोर्ट एण्ड सप्लाई कोआपरेटिव एसोसिएशन’ नाम दिया गया.

1913 तक गढ़वाल में 10 कुली एजेन्सियों की स्थापना हो गई. अब धीरे-धीरे प्रत्येक परिवार से एक रूपए की जगह, एक रूपया बारह आना से लेकर दो रूपए आठ आना तक लिया जाने लगा. संचित रााशि का उपयोग बेगार और बर्दायश की व्यवस्था के लिए किया जाता था. अब इन कुली एजेन्सियों के संचालन के लिए भी एक समिति की ज़रूरत महसूस होने लगी. लिहाज़ा एजेन्सियों के सफल संचालन के लिए एक समिति का गठन किया गया. जिसकी ज़िम्मेदारी रायबहादुर तारादत्त गैरोला को सौंपी गई.

गढ़वाल की तर्ज पर कुमाऊं के कुछ भागों जैसे नैनीताल, अल्मोड़ा, भीमताल, खैरना आदि जगहों में कुली एजेन्सियों की स्थापना की गई. दो रूपए वार्षिक कुली कर लेकर स्थायी कुली सभी के बदले का कार्य करने लगे. मगर इस व्यवस्था को बेगार का ही एक रूप माना गया. क्योंकि इससे अंग्रेजों को तो कोई फ़र्क पड़ नहीं रहा था, उनके लिए काम तो अभी भी मुफ़्त में ही हो रहा था. कुमाऊं के बुद्विजीवियों ने कुली एजेन्सी को सही हल नहीं माना.

सितम्बर 1916 को हरगोविन्द पंत, गोविन्द बल्लभ पंत, बद्रीदत्त पाण्डे, इन्द्रलाल साह और मोहन सिंह दरमवाल जैसे अन्य क्रांतिकारी नेताओं ने मिलकर एक सामाजिक संगठन कुमाऊं परिषद् का गठन किया. 1918 में जब कुमाऊं परिषद् का हल्द्वानी में दूसरा अधिवेशन हुआ तो तारादत्त गैरोला की अध्यक्षता में ये प्रस्ताव स्वीकृत कर लिया गया कि सरकार को दो साल के अन्दर-अन्दर कुली बेगार प्रथा को समाप्त करना होगा, अन्यथा ये मांग किसी बड़े जनान्दोलन का रूप ले लेगी.

कुली बेगार के ख़िलाफ़ अब व्यापक माहौल बनने लगा था. साल 1920 में जब कुमाऊँ परिषद का चौथा अधिवेशन हुआ तो फैसला लिया गया कि 14 जनवरी को मकर संक्रांति के दिन बड़ा विद्रोह किया जाएगा. तय हुआ कि उत्तरायणी मेले में जब हज़ारों की संख्या में पहाड़ के अलग-अलग इलाकों से लोग शामिल होंगे तो उस दिन कुली बेगार के खिलाफ सामूहिक विद्रोह को अंजाम दिया जाएगा. 10 जनवरी 1921 के दिन बद्रीदत्त पाण्डे, चिरंजीलाल साह, हरगोविन्द पंत सहित कुमाऊं परिषद् के 50 से ज्यादा कार्यकर्ता बागेश्वर पहुंचे. धीरे-धीरे उनके साथ सैकड़ों लोग जुड़ते गए. 12 जनवरी को जब ये जुलूस दोपहर करीब ढ़ाई बजे बागेश्वर पहुंचा तो हज़ारों लोग इसमें शामिल हो गए. लाल कपड़े के एक बैनर में ‘कुली बेगार, कुली उतार बंद करो’ लिखा हुआ था. तमाम लोग वन्देमातरम, भारत माता की जय, महात्मा गांधी की जय के नारों के साथ बाज़ार भर में कुली बेगार के खिलाफ़ आवाज़ बुलन्द कर रहे थे.

13 जनवरी को ये जुलूस 10 हजार लोगों की विशाल जनसभा में तब्दील हो गया. इस सभा में कुमाऊं परिषद् के नेता भाषण दे रहे थे. हरगोविन्द पंत ने जनता को स्पष्ट किया कि कुली बेगार न्यायसंगत नहीं है और इसकी पुष्टि उच्च न्यायालय ने भी की है. अब बद्रीदत्त पाण्डे को भाषण देना था. उन्होंने कहा – “ये कानून ’न अपील, न दलील, न वकील’ का है. बेगार की सफलता के बाद हम जंगलों के लिए आन्दोलन करेंगे. फिलहाल आप सभी लोग लीसा निकालना, लकड़ी चीरना तथा जंगल के ठेके का काम लेना छोड़ दें.” इसके बाद उन्होंने जोशीले अंदाज़ में लोगों से पास में ही मौजूद बागनाथ मंदिर की शपथ लेकर कुली बेगार को कभी न मानने के लिए कहा. कुछ देर तक हज़ारों लोगों की भीड़ में ख़ामोशी छाई रही. लेकिन कुछ ही सेकेण्ड बाद सभी लोगों ने सामूहिक स्वर में शपथ लेते हुए कहा – हम कुली नहीं बनेंगे. सभी ने हाथ उठाकर उतार न देने की घोषणा की. ‘सरकार अन्यायी है’, ‘स्वतंत्र भारत की जय’ और ‘महात्मा गाँधी की जय’ के नारों के साथ सरयूबगड़ घाटी गूंजने लगी. इसके साथ ही मालगुजारों ने अपने-अपने गांवों के कुली रजिस्टरों को सरयू नदी में फेंकना शुरू कर दिया. देखते ही देखते सारे रजिस्टर सरयू नदी के प्रवाह में बह गए. इस घटना को देखकर अंग्रेज अधिकारियों के होश फ़ाख़्ता हो गए. उन्होंने जनता के इस विद्रोह को काबू करने की कोशिश की मगर हज़ारों लोगों के इस आक्रामक प्रतिरोध को देखते हुए अंग्रेज विफल रहे.

शंभू प्रसाद शाह अपनी पुस्तक ‘गोविन्द बल्लभ पंत – एक जीवनी’ में इस घटना का ज़िक्र करते हुए कहते हैं कि – “डिप्टी कमिश्नर डाईबिल दरअसल नेताओं को गिरफ्तार कर जनता पर गोलियां चलाना चाहता था, लेकिन उस समय उसके पास कुल 21 अफसर, 25 सिपाही और मात्र 700 गोलियां थीं, जबकि वहां मौजूद लोगों की संख्या 15 हजार से भी ज्यादा थी. नेताओं की गिरफ्तारी अथवा गोली चलाने की स्थिति में भीड़ के हाथों एक भी अंग्रेज अफसर और सिपाही के जीवित बच पाने की संभावना नहीं थी, लिहाजा उसने अपना इरादा छोड़ दिया.”

बद्रीदत्त पाण्डे और उनके साथियों को भी इस बात की आशंका थी कि कहीं हज़ारों लोगों पर अंग्रेज गोलियां न चला दें. इस घटना के दौरान बद्रीदत्त पाण्डे ने डायबिल से कहा – “कमिश्नर साहब कितनी गोलियां चलाओगे तुम? चलाओ पर ये समझ लो कि जनता की चट्टान उनसे नहीं टूटेगी, तुम्हारी गोलियां ख़त्म हो जाएंगी औऱ तुम असहाय खड़े रह जाओगे. यहां चालीस हज़ार बहादुर हैं. ये सब लाशों के ढ़ेर हो जाएंगे, किन्तु इनमें से एक भी पीछे नहीं हटेगा”

इसी आन्दोलन के पश्चात बद्रीदत्त पाण्डे को कुमाऊं केशरी के नाम से जाना जाने लगा था. कुली बेगार आन्दोलन की सफलता और यहां की जनता के साहस को देख महात्मा गांधी बागेश्वर पहुंचे. यहां उनसे मिलने हज़ारों की संख्या में लोग पहुंच गए थे. बाद में उन्होंने चनौंदा में गांधी आश्रम की स्थापना की. उत्तराखण्ड के कुली बेगार आन्दोलन का उल्लेख गांधी जी ने अपनी किताब ‘यंग इंडिया’ में करते हुए लिखा है – इसका प्रभाव सम्पूर्ण था, यह एक रक्तहीन क्रांति थी. गांधी जी ने इसे जनता की संगठन क्षमता से जोड़ा.

कुली बेगार आन्दोलन का प्रभाव कुमाऊं क्षेत्र में अधिक देखने को मिला था. उत्तराखण्ड के प्रख्यात कवि गौरी दत्त पांडे ‘गौर्दा’ ने उस वक्त कुली बेगार को लेकर एक कविता लिखी थी. जिसके बोल थे:
मुलुक कुमाऊं का सुणी लिया यारो
झन दिया, झन दिया कुली बेगार

उत्तराखण्ड के इतिहास में घटित इस आन्दोलन की गूंज सम्पूर्ण भारत में सुनाई दी. आज भी 14 जनवरी को मकर संक्रांति के दिन बागेश्वर में सरयू नदी के किनारे सांकेतिक रूप से सरकार की जनविरोधी नीतियों से सम्बन्धित कागज नदी में प्रवाहित किए जाते हैं.

गढ़वाल में चले कुली बेगार आन्दोलन का ज़िक्र इतिहास में कम ही मिलता है. डॉ शिव प्रसाद डबराल अपनी किताब टिहरी गढ़वाल राज्य का इतिहास भाग – 2 में लिखते हैं – “1919 में गढ़वाल के मुकुन्दीलाल बैरिस्टर और अनुसूया प्रसाद बहुगुणा अमृतसर कांग्रेस में सम्मिलित हुए. उक्त अवसर पर कांग्रेस ने रौलेट एक्ट के विरूद्ध घोर विरोध प्रकट किया था. अमृतसर कांग्रेस से लौटकर इन दोनों ने गढ़वाल में राजनीतिक जागृति फैलानी आरम्भ की. उन्होंने कुली बेगार की समाप्ति के लिए, जिसके प्रति जनता में भारी रोष था, तीव्र आन्दोलन आरम्भ कर दिया. 1919 से 1920 में सारे गढ़वाल में कुली बेगार और जंगलात में अधिकारों के लिए घोर आन्दोलन चला. पहली जनवरी 1921 को मुकुन्दीलाल बैरिस्टर की अध्यक्षता में चमेठाखाल में एक सार्वजनिक जनसभा हुई. इसमें खन्द्वारी के ईश्वरीदत्त ध्यानी, मंगतराम खन्तवाल आदि ने पधानचारी से त्यागपत्र दे दिया. क्योंकि कुली बेगार का प्रबन्ध करने तथा कुली बेगार न देने वालों को दण्ड देने का माध्यम पधानों को भी बनना पड़ता था.”

गजेन्द्र रौतेला की किताब, उत्तराखण्ड के जनान्दोलन में ज़िक्र मिलता है कि मार्च 1919 में जब श्रीनगर गढ़वाल में कुमाऊं परिषद् की एक सभा आयोजित हुई, तो इसकी अध्यक्षता कर रहे तारादत्त गैरोला ने अपने भाषण में पहले तो ब्रिटिश सरकार की प्रशंसा की और बाद में कुली बेगार प्रथा को उनके माथे का कलंक मानते हुए इस प्रथा समाप्त करने की मांग की. संभवत: यह उनकी एक चालाकी थी कि रौलेट एक्ट के कारण पूरे देश में उग्र आन्दोलनों का सामना कर रही अंग्रेज सरकार उनकी बात के द्रवित होकर कुली बेगार को ख़त्म कर दे. मगर रौलेट एक्ट पारित होने के बाद और गांधी जी की गिरफ़्तारी के बाद सारे समीकरण बदल गए.

6 अप्रैल 1919 को महात्मा गांधी ने जब देश भर में सत्याग्रह आन्दोलन छेड़ा, तो कई सारे छात्र-छात्राओं से अपील की गई कि वे स्कूल छोड़ कर विरोध दर्ज करें और आन्दोलन में हिस्सा लें. ऐसे में बनारस से कुछ गढ़वाली छात्र वापस अपने-अपने घऱों की ओर आने लगे. इनमें भोलादत्त चन्दोला, भोलादत्त डबराल, भैरवदत्त धूलिया, जिवानन्द बडोला औऱ गोवर्धन बडोला शामिल हुए. गढ़वाल में बैरिस्टर मुकुन्दीलाल और गढ़ केशरी के नाम से विख्यात अनुसूया प्रसाद बहुगुणा ने ही मुख्य रूप से कुली बेगार आन्दोलन की कमान अपने हाथ में ली हुई थी.

ब्रिटिश गढ़वाल और ब्रिटिश कुमाऊं के अतिरिक्त टिहरी रियासत में भी कुली बेगार व्याप्त थी. टिहरी गढ़वाल राज्य का इतिहास भाग -2 में डॉ शिव प्रसाद डबराल लिखते हैं – प्रजा को राज्य के छोटे-बड़े सभी पदाधिकारियों का भार तो ढ़ोना ही पड़ता था. इसके अतिरिक्त यदि कोई अंग्रेज अथवा राज्य से बाहर का कोई भद्रपुरूष राजा से या राज्य के उच्चाधिकारियों से आज्ञा लेकर राज्य में घूमने-फिरने, शिकार खेलने आदि किसी भी व्यक्तिगत या सरकारी कार्य से राज्य में भ्रमण करने आता था, तो उसके और उसके साथ चलने वाले राजकर्मचारियों के भार को ढ़ोना पड़ता था.

इसके अलावा टिहरी राज्य में प्रत्येक गांव के हर घर से हर साल राजा के घोड़ों और अन्य पशुओं के लिए घास तथा राजपरिवार एवं राजकर्मचारियों के लिए दूध, घी और अन्न बेगार के रूप में पहुंचाया जाता था. हर पट्टी के प्रत्येक गांव से सभी परिवारों से एक-एक व्यक्ति, एक साथ कोई दिन सुनिश्चित कर के अपने दल के साथ राजमहल पहुंचते थे. ऐसा करने के बाद उन्हें एक रसीद प्राप्त होती थी. ये रसीद उन्हें सम्बन्धित पट्टी के थानेदार या पटवारी को दिखानी होती थी. रसीद न दिखाने पर उन्हें दोगुनी बेगार देनी पड़ती थी. ऐसे में कई बार राजकर्मचारी रसद देने से पहले उनसे अपने व्यक्तिगत कार्य भी करवाते थे. कई बार एक महीने तक भी उन्हें वहीं रूका रहना पड़ता था. हर तरह से जनता पर ज़ुल्म किए जा रहे थे.

1920-1921 में जब ब्रिटिश गढ़वाल और ब्रिटिश कुमाऊं में कुली बेगार के खिलाफ जनता आग बबूला थी, नरेन्द्रशाह के शासनकाल सम्बन्धी एक डायरी से जानकारी मिलती है कि राजा नरेन्द्र शाह ने भी अपने राज्य में 1920 में बेगार प्रथा के उन्मूलन की घोषणा कर दी थी. हालांकि घोषणा के बावजूद भी बेगार वसूली जाती रही. रियासत की ओर से प्रकाशित होने वाले गजट के 13 अक्टूबर 1941 के अंक में बेगार बन्द करने के सम्बन्ध में घोषणा प्रकाशित की गई थी. मगर पटवारी एवं राजकर्मचारी इसके बाद भी ग्रामीणों से बेगार लेकर उनका शोषण करते रहे.
बागेश्वर के विशाल जनआक्रोश के बाद इस आन्दोलन की चिंगारी पूरे उत्तराखण्ड में फैल चुकी थी. मार्च 1921 तक कुली न के बराबर मिल रहे थे. ऐसे में धारा 144 लगाई गई. कई सारी गिरफ्तारियां होने लगीं. इसके बावजूद जनता एकजुट रही और कुली बेगार, कुली उतार देने से इनकार करती रही.

अंग्रेज अधिकारियों को अब सब मुश्किल लगने लगा. देश में गांधी जी द्वारा चलाए जा रहे असहयोग आन्दोलन का असर था कि भारत की अन्य कई जगहों में भी स्थानीय मुद्दों को लेकर लोग मुखर होने लगे थे, जिसका असर कुमाऊं और गढ़वाल में भी इस तरह से देखने को मिला. डॉ0 शिव प्रसाद डबराल की किताब टिहरी गढ़वाल राज्य का इतिहास भाग – 2 में ज़िक्र मिलता है कि दिसम्बर 1921 में जब पी0 मैसन गढ़वाल का डिप्यूटी कमिश्नर था, तब सरकार ने सदन में एक विधेयक लाकर इस प्रथा को गैरकानूनी घोषित कर दिया था. कुली बेगार आन्दोलन को असहयोग की पहली ईंट और रक्तहीन क्रांति के नाम से जाना गया. साल 2021 को इस ऐतिहासिक आन्दोलन के 100 साल पूरे हो चुके हैं.

स्क्रिप्ट: अमन रावत

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