पहाड़ी औखाणों में कमाल का मर्म छिपा होता है. लोक से निकले ये औखाणे अपने-आप में इतनी गहरी बातें समेटे होते हैं कि अक्सर एक ही पंक्ति में पूरे समाज की हक़ीक़त बयां कर देते हैं. जैसे यही औखाणा देखिए कि ‘कितुलु कारो गुरौकी सौर, तकण्ये – तकण्ये मौरू.’ हिंदी में कहें तो केंचुआ चला सांप से प्रतिस्पर्धा करने और खिंच-खिंच के मर गया. उत्तराखंड के wanna – be नेताओं और influencers की भी ठीक ऐसी ही स्थिति है. हर कोई अपने-आप को दूसरे से बड़ा हिंदू या सबसे बड़ा पहाड़ी घोषित करने में खपा जा रहा है. पहाड़ों के मूल सवाल गौण चुके हैं और मूल निवासियों के अधिकारों की लड़ाई को एक संकीर्ण मल-युद्ध में बदलने की कोशिश जारी है जहां सरनेम देख कर भुजाएं फड़फड़ाई जा रही हैं. सड़क किनारे होने वाली हर हिंसक घटना में सबसे पहले यही तलाशा जा रहा है कि दोनों पक्षों का जाति-धर्म क्या होगा.
मामला हिंदू-मुसलमान और पहाड़ी-मैदानी की बाइनेरी में आता भी है या नहीं. बाइनेरी में आता है तो स्वघोषित रक्षा दल मुस्तैद हो जाते हैं और बाइनेरी से बाहर का मामला हो तो कांडे लगें, तब चाहे कोई कच्या-कच्या कर एक-दूसरे की थिंचवाणी बना दे, किसी को फ़र्क़ नहीं पड़ता. पहाड़ के मुद्दों की लड़ाई इतनी छिछली और हल्की हो जाएगी, ये कल्पना उन स्वप्नदृष्टा लोगों ने कभी नहीं की थी जिन्होंने तीन-चार दशक पहले उत्तराखंड को एक समृद्ध पहाड़ी राज्य बनाने का सपना देखा था और इस लड़ाई की नींव रखी थी. तो आज के एक्स्ट्रा कवर में इस पर विस्तार से चर्चा करेंगे कि उत्तराखंड की सबसे मजबूत लड़ाई लड़ने वाले उत्तराखंड क्रांति दल के सपनों का प्रदेश कैसा था और उन्होंने इसके लिए कैसा दस्तावेज तैयार किया था.