फ्रांस के मोर्चों में दफ़्न गढ़वाली फ़ौजियों की शौर्य गाथा.

उत्तराखंड के सैनिकों की जांबाज़ी के क़िस्से ब्रिटिश हुक़ूमत के दौर से ही न सिर्फ़ हिंदुस्तान में बल्कि दुनिया भर में गूंजते रहे हैं.. ऐसे ही क़िस्सों की पड़ताल करते हमारे इस ख़ास प्रोग्रैम ‘पलटन’ की पहली कड़ी में आज हम आपको ‘गढ़वाल की एक मशहूर कहावत’ से जुड़ा एक रोमॉंचक क़िस्सा सुनाने जा रहे हैं..

उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग ज़िले में त्रिजुगी नारायण नाम की एक जगह है. यहां तक पहुंचने का ट्रैक बेहद कठिन माना जाता है. एक दम खड़ी चढ़ाई किसी की भी सांस फुला देती है. ये चढ़ाई टिहरी जनपद के घुत्तू गांव से थोड़ा आगे बढ़ने पर, पंवाली तक इतनी ख़तरनाक हो जाती है कि कहावत ही बन गई, ‘जर्मनी की लड़ाई और पंवाली की चढ़ाई’.

गढ़वाल के एक छोटे से क्षेत्र की तुलना सीधे जर्मनी की लड़ाई से करने वाली इस कहावत के पीछे इतिहास का एक बेहद रोचक क़िस्सा छुपा है. ऐसा क़िस्सा जिसके चलते फ्रांस में आज भी गढ़वाल राइफ़ल्स को बड़ी अदब से देखा जाता है. यह क़िस्सा गढ़वाल राइफ़ल्स के गौरवशाली इतिहास का वह हिस्सा है जिसकी गवाही देते कई स्मारक और म्युज़ियम फ़्रांस में आज भी मौजूद हैं.

इस क़िस्से को समझने के लिए अपनी स्मृतियों का रिवाइंड बटन दबा कर समय में थोड़ा पीछे चलते हैं. सितम्बर 2016 की बात है. फ्रांस के रिचेबर्ग में एक निर्माण कार्य के चलते खुदाई हो रही थी. इसी दौरान वहां से दो नर कंकाल मिले. इन नर कंकालों की तफ़तीश से पता चला कि ये शव लगभग 100 साल पहले के हैं. शवों के साथ ही दो बैज भी पाए गए जिन पर लिखा था – 39 गढ़वाल राइफ़ल्ज़. इन बैजेस ने स्पष्ट कर दिया कि सौ साल से फ़्रान्स की धरती में दफ़्न ये लोग गढ़वाल राइफ़ल्स के योद्धा थे.

खुदाई में मिले इन नर कंकालों ने इतिहास के गर्त में समा चुकी कुछ गुमनाम कहानियों पर जमीं धूल हटा दी. इस पर शोध शुरू हुए और माना गया कि अगर उन जगहों पर और खुदाई की जाये तो सम्भव है कि और भी कई गढ़वाली योद्धाओं के शव यहां मिल सकते हैं. सिर्फ़ रिेचेबर्ग ही नहीं, बल्कि दूसरे विश्व युद्ध के दौरान फ़्रॉंस के कुछ और चर्चित मोर्चों, जैसे फेस्टूबर्ट और न्यू चेपल्स में भी अगर खुदाई की जाये तो दोनों ही मोर्चों से कई रोचक कहानियाँ निकलकर सामने आ सकती हैं.

वही कहानियाँ, जिनका जिक्र मशहूर साहित्यकार और घुमक्कड़ राहुल सांकृत्यायन के साथ ही इतिहासकार डॉ. शिव प्रसाद डबराल की किताबों में भी मिलता है. इन किताबों में फ्रांस के अलग-अलग मोर्चों पर लड़े योद्धाओं के संघर्ष की कई कहानियाँ दर्ज हैं.

तो मशहूर गढ़वाली कहावत, ‘जर्मनी की लड़ाई और पंवाली की चढ़ाई’ भी ऐसे ही एक मोर्चे से निकली एक कहावत है.

फ़्रांस में हुई इस लड़ाई के क़िस्से गढ़वाल की स्मृतियों में आज तक की सबसे जानलेवा और मुश्किल लड़ाई के तौर पर दर्ज हैं. गढ़वाल की घनसाली बेल्ट के कई योद्धा इस लड़ाई में शहीद हुए थे. और जो बच कर वापस लौटे, वो इस युद्ध की तुलना, ‘पांवली की दुर्गम चढ़ाई’ से करते रहे. यहीं से इस कहावत ने जन्म लिया.

असल में, रिचेबर्ग का मोर्चा फ्रांस और जर्मनी के बार्डर से लगता था. जर्मनी ने वहां युद्घ की रणनीति के तहत सत्तर से ज़्यादा बड़ी-बड़ी नालियां खोद डाली थी जिन्हें खंदक कहा जाता था. फ्रांस की सेना जब इन खंदकों को पार नहीं कर पाई तो उन्होंने इंग्लैंड के सैन्य अधिकारियों को एक ख़त लिखकर मदद मॉंगी. उन्होंने गुहार लगाई कि उनकी सेना इन खंदकों को पार करने में नाकाम है इसलिए दुनिया की सबसे बेहतरीन इन्फेंट्री को रिचेबर्ग और न्यू चेपल्स का मोर्चा पार करने के लिए भेजा जाए.

मित्र राष्ट्रों में शामिल इन देशों के इस आपसी पत्राचार के बाद गढ़वाल रेजीमेंट की उनतालीस बटालियन को 21 सितंबर 1914 के दिन इस मोर्चे के लिये पानी के जहाज़ से रवाना कर दिया गया.

यह बटालियन 13 अक्टूबर को इन दोनों मोर्चों पर पहुंची. कहा जाता है, फ्रांस की सेना ने गढ़वाल रेजीमेंट के सिपाहियों को युद्ध क्षेत्र का भूगोल समझाए बिना ही सीधे मोर्चों पर झोंक दिया. अपने अदम्य साहस का परिचय देते हुए गढ़वाली सैनिक सीधा खंदकों में घुस गये.

गढ़वालियों ने ये हमला बेहद तेज़ रफ़्तार से किया. जर्मनी के लिए यह अप्रत्याशित था. खंदकों में उस समय पेट्रोलिंग के लिये आए पचास से ज़्यादा जर्मन सैनिक मौजूद थे. गढ़वालियों ने उन सभी को बंधक बनाकर अपने पहले ही दांव में इस मोर्चे पर बड़ी जीत हासिल कर ली.

अब तक युद्ध में बढ़त बनाए जर्मनी के लिए इस औचक हार के बेहद गहरे अर्थ हो सकते थे. इसे भाँपते हुए जर्मन सैन्य अधिकारियों ने तुरंत एक निर्णायक फैसला लिया. उन्होंने हुक़्म दिया कि गढ़वाली सैनिकों के क़ब्ज़े वाले इन खंदकों में इतने हैंड ग्रेनेड फैंके जाएं कि वो ध्वस्त हो जा जाएं और उनमें मौजूद सारे सैनिक वहीं ज़मींदोज़ हो जाएं. फिर चाहे वो सैनिक मित्र राष्ट्रों के हों या फिर ख़ुद जर्मनी के.

गढ़वाल का इतिहास (भाग-दो) में डा. शिव प्रसाद डबराल लिखते हैं.. ”हैंड ग्रेनेड फेंकने से गीली मिट्टी से बने खंदक ढह गये और उसमें जर्मन सैनिकों के साथ ही कई गढ़वाली सैनिक भी इतिहास में दफ़्न हो गये. ऐसा ही रिचेबर्ग और फेस्टूवर्ट में भी हुआ.”

गढ़वाल रजीमेंट की एक दूसरी बटालियन को गढ़वाली सैनिकों की मदद के लिये रवाना किया गया. इसमें पेशावर कांड के नायक चंद्र सिंह गढ़वाली भी शामिल थे. चंद्रसिंह गढ़वाली की जो जीवनी राहुल सांकृत्यायन ने लिखी है, उसमें भी इस मोर्चे का उल्लेख मिलता है..

फ्रांस के मोर्चों पर गढ़वाल रेजीमेंट के पहुंचने के बाद युद्ध अपने चरम पर पहुंच गया. जो जर्मनी अब तक बेधड़क आगे बढ़ रहा था, उसके पैर अब ठिठकने लगे और वो पीछे हटने लगा. गढ़वालियों को जिस मक़सद से फ़्रान्स भेजा गया था, उसे बखूबी पूरा करने में पहाड़ी योद्धा कामयाब हो चुके थे.

न्यू चैपल्स के मोर्चे में अदम्य साहस का प्रदर्शन करने वाले टिहरी गढ़वाल के राइफ़लमैन गबर सिंह नेगी और फेस्टूबर्ट के मोर्चे पर वीरता की गाथा लिखने वाले चमोली के दरबान सिंह नेगी को आगे चलकर उनकी जॉंबाज़ी के लिए, इंग्लैंड के सबसे बड़े वीरता पुरस्कार, ‘विक्टोरिया क्रॉस’ से नवाज़ा गया. ये पहला मौक़ा था जब किसी भारतीय सिपाही को इतना बड़ा सैन्य सम्मान दिया गया.

इस भीषण युद्ध के तुरंत बाद इंग्लैंड के राजा जॉर्ज पंचम भारत आये और गढ़वाल रजीमेंट को ‘रॉयल गढ़वाल राइफ़ल्स’ से नवाज़ा. इस वीरता के बाद गढ़वाल रेजीमेंट को भारत वापस भेजने के बजाए, मेसोपोटामिया के मोर्चों पर भेजा गया जहां फिर से गढ़वाली सैनिकों ने फ़तह हासिल की. 

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