साल था 1988. गढ़वाल के पौड़ी शहर में एक तेज-तर्रार पत्रकार के रातों-रात गायब हो जाने की चर्चाएँ गर्म थी. अमर उजाला में बतौर स्ट्रिंगर काम करने वाले इस पत्रकार को आख़िरी बार शहर के ‘सन एंड स्नो’ होटल में जाते हुए देखा गया था. लेकिन अब वो लापता था और शहर में दबी ज़ुबान ये चर्चा थी कि उसे गायब करवाने, या संभवत: उसकी हत्या करवाने में, शराब माफिया मनमोहन सिंह नेगी उर्फ मन्नू का हाथ है. मनमोहन नेगी उस दौर का ऐसा कुख्यात था जिसकी राजनीतिक पकड़ काफी मजबूत थी. कई बड़े नेताओं का संरक्षण उसे हासिल था. इसी के चलते उसने पहाड़ में शराब के कारोबार पर ऐसा एकाधिकार जमा लिया था कि पॉंटी चड्ढ़ा और डीपी यादव जैसे बड़े शराब माफियाओं तक को पहाड़ से बाहर कर दिया था. उसका वर्चस्व लगातार बढ़ रहा था और पुलिस से लेकर प्रशासन तक सभी मूक दर्शक बने हुए थे.
मनमोहन नेगी की दबंगई एक तरह से सभी ने स्वीकार कर ली थी लेकिन एक पत्रकार था जो खुलकर उसके शराब तंत्र के ख़िलाफ़ लिख रहा था. उक्त पत्रकार की धारदार रिपोर्ट्स लगातार मनमोहन नेगी और उसके गुर्गों को असहज कर रही थी. इसीलिए जब इस पत्रकार के अचानक गायब हो जाने की खबर सामने आई तो सीधा-सीधा शक मनमोहन नेगी के गैंग पर ही गया. जब कोई खोज-खबर नहीं मिली तो गढ़वाल और कुमाऊं से लेकर लखनऊ और दिल्ली तक के पत्रकार और सामाजिक संगठन एकजुट होने लगे और लापता पत्रकार के लिए न्याय की मांग उठने लगी. तय किया गया कि 2 अप्रैल 1988 के दिन पौड़ी शहर में एक विशाल प्रदर्शन आयोजित किया जाएगा. लेकिन स्थानीय लोगों में कुख्यात मनमोहन नेगी का खौफ इस कदर था कि लोग उसके ख़िलाफ़ हो रहे इस आयोजन में शामिल होने से कतरा रहे थे. ऊपर से मनमोहन नेगी के समर्थक भी कम नहीं थे जिन्होंने उसके पक्ष में माहौल बनाने के लिए पूरे शहर में उसकी तारीफ़ों वाले पोस्टर लगा दिए थे.
शमशेर सिंह बिष्ट ने अपने एक लेख में उस दिन को याद करते हुए लिखा है कि,
‘2 अप्रैल की सुबह सारा पौड़ी शहर मनमोहन सिंह नेगी के पक्ष में राजपूत संगठन के पोस्टरों से पट चुका था. इन पोस्टरों में लिखा गया था, ‘माफिया नहीं मसीहा है’. हम लोगों की संख्या इतनी कम थी कि जुलूस निकालना फिजूल था. समझ नहीं आ रहा था क्या करें. तभी देखा कि कुछ दूर से गांव वालों का एक विशाल जुलूस नारे लगाते हुए आ रहा था. जुलूस के आगे-आगे राजेंद्र रावत और ओंकार बहुगुणा चल रहे थे. इतने लोगों को देख हमारी निराशा दूर हो गई. धीरे-धीरे पौड़ी शहर के कई लोग जुलूस से जुड़ते गए और शहर में फैला आतंक टूट गया.’
पहाड़ के जिस पत्रकार को न्याय दिलाने के लिए स्थानीय लोग उस दौर के सबसे कुख्यात माफिया से लोहा लेने उतर पड़े थे, उनका नाम था उमेश डोभाल.
ये वो दौर था जब न मोबाइल फोन होते थे, न इंटरनेट, न सोशल मीडिया और न ही जगह-जगह सीसीटीवी की निगरानी. लिहाजा, खोजी पत्रकारिता तब और भी ज्यादा चुनौतीपूर्ण थी. अस्सी के दशक में पहाड़ में शराब माफियाओं का जोर बढ़ने लगा था. ऐसे में बढ़ती नशाखोरी के खिलाफ पहाड़ की जनता भी लामबंद हो रही थी. ‘नशा नहीं, रोजगार दो’ के नारे बुलंद होने लगे थे और देखते ही देखते इस नारे ने बड़े जनआंदोलन की शक्ल ले ली थी. महिलाएं और बच्चे इस आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे थे.
पौड़ी गढ़वाल में शराब की खुली बिक्री पूरी तरह से प्रतिबंधित थी. सिर्फ़ परमिट-धारकों को ही सीमित मात्रा में शराब बेचे जाने की व्यवस्था की गई थी. गढ़वाल में चार जगह ऐसे ठेके खोले गए थे जहां से परमिट दिखाकर शराब ख़रीदी जा सकती थी. ये ठेके सतपुली, लैंसडाउन, कोटद्वार और पौड़ी में थे. मगर माफिया गिरोह इतना सक्रिय था कि गांव-कस्बों में भी शराब आसानी से मिल जाती थी. उनका तंत्र इतना मज़बूत था कि दूर-दराज के इलाकों में भी वाहनों और अन्य साधनों से शराब पहुंचाई जा रही थी. परमिट सिस्टम का तोड़ भी माफ़ियाओं ने कई फ़र्ज़ी परमिट बनवाकर निकाल लिया था. नियम तो ये था कि सिर्फ़ ‘चीफ मेडिकल ऑफिसर’ द्वारा परमिट जारी किए जाएंगे. साल 1981 में पौड़ी ठेके के अंतर्गत ऐसे कुल 250 परमिट जारी किए गए थे. एक परमिट पर एक महीने में केवल 4 बोतलें ही ख़रीदी जा सकती थीं. इस तरह एक महीने में अधिकतम 1000 बोतलें ही बिक सकती थीं और सौ रुपए प्रति बोतल के हिसाब से हर महीने अधिकतम एक लाख रुपए का राजस्व बनता था. यानी साल भर का राजस्व 12 लाख ही हो सकता था लेकिन उसी साल अकेले पौड़ी का ठेका ही 22 लाख रुपए में नीलाम हुआ था. इन तमाम तथ्यों के विश्लेषण के साथ उमेश डोभाल ने माफियाओं के शराब तंत्र का भांडा फोड़ते हुए धारदार रिपोर्टिंग की.
शराब का अवैध व्यापार तब किस तरह फल-फूल रहा था, इसका अंदाजा आप कुछ आँकड़ों से लगाइए. साल 1987 में शराब के ठेकों की बोलियों पर नीलामी 43 लाख रुपए थी, 1988 में 52 लाख पहुंच गई और 1989 में तो बढ़कर 66 लाख तक हो गई थी. मगर गढ़वाल और कुमाऊं की जनता भी शराब के खिलाफ मजबूती से लामबंद हो चुकी थी. नशा नहीं रोजगार दो आंदोलन का असर ये रहा कि उत्तर प्रदेश सरकार को कई जगहों पर शराब प्रतिबंधित करनी पड़ी. हालांकि लोगों का आक्रोश जब कुछ ठंडा पड़ा, तो शराब माफियाओं के दबाव में आकर सरकार ने फिर से ये प्रतिबंध हटा दिया. कुमाऊं क्षेत्र में 254 ठेकों के अनुबंधों की नीलामी एक शराब माफिया को कर दी गई. माफियाओं के हौंसले तब किस कदर बुलंद थे, इसका अंदाजा आप 26 अगस्त 1984 को अमर उजाला के बरेली अंक में प्रकाशित इस खबर से लगाइए. जिसका शीर्षक था- ‘शराब के ठेकेदारों का पुलिस को नोटिस’. इस खबर में लिखा था,
‘पता चला है कि पौड़ी जिला प्रशासन तथा पुलिस अधीक्षक को कोटद्वार अंग्रेजी शराब की दुकान के ठेकेदारों ने आबकारी नियमों के विरुद्ध पुलिस कांस्टेबलों की अंग्रेजी शराब की दुकान पर तैनाती के बाद हुई राजस्व हानि के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए नोटिस दिया है. ठेकेदारों का आरोप है कि आबकारी नियमों को ताक पर रख कर पुलिस कांस्टेबल दुकान पर तैनात किए गए हैं. जिससे परमिट-धारी शराब खरीददार भी नहीं आ रहे हैं. इस कारण उन्हें अब तक करीब 3 लाख रुपए का घाटा हो चुका है.’
सरकार और प्रशासन भी गुपचुप तरीके से माफियाओं को सहयोग करते थे. इस सबके बावजूद उमेश अपनी कलम बेबाकी और ईमानदारी के साथ चलाते रहे. पीडब्ल्यूडी के कार्यों में हो रहे भ्रष्टाचार पर भी उन्होंने अलग-अलग समाचार पत्र-पत्रिकाओं में कई लेख लिखे.
यही वो दौर भी था जब कुख्यात मनमोहन नेगी की पकड़ मज़बूत हो रही थी और चारों तरफ उसके चर्चे थे. पौड़ी पुलिस स्टेशन में उसका नाम ए-क्लास हिस्ट्रीशीटर के रूप में दर्ज हो चुका था. हालाँकि जनता के एक बड़े तबके के बीच उसकी छवि मसीहा जैसी थी और इन लोगों का खूब समर्थन उसे मिल रहा था. कई स्थानीय युवाओं को रोजगार के नाम पर उसने अपने साथ शराब के धंधे में जोड़ लिया था. शराब के इस कारोबार में पूरे पहाड़ पर मनमोहन नेगी का लगभग एक-क्षत्र राज हो चुका था.
शराब माफ़ियाओं के निरंकुश तंत्र से एक तरफ़ जहां शासन-प्रशासन ने आंखें फेरी हुई थी वहीं दूसरी तरफ़ उमेश डोभाल लगातार इन मुद्दों पर लिख रहे थे. ‘कलम नहीं बंदूक लिखेगी खबर’, ‘गढ़वाल मंडल में टिंचरी के व्यापार की दास्तान’, ‘नशा नहीं रोजगार दो’ और ‘शराब का धंधा खूब फल फूल रहा है गढ़वाल में’ जैसे अपने लेखों से उमेश डोभाल शराब माफियाओं को खुली चुनौती दे रहे थे. उनके लिखे लेख ‘कैसे बंदूक की नोक पर टेंडर लूटे जाते हैं’ का तो असर ये रहा कि मनमोहन नेगी के ठेके का लाइसेंस रद्द कर दिया गया. ऐसे में उमेश डोभाल शराब माफियाओं की आंख की वो किरकिरी बन चुके थे जिसे माफिया किसी भी हाल में रास्ते से हटाने चाहते थे.
पत्रकारिता को अपना मिशन बना चुके उमेश डोभाल का जन्म 17 फरवरी 1952 को अविभाजित उत्तर प्रदेश में पौड़ी जिले के सिरोली गांव में हुआ था. माँ सुमित्रा देवी और पिता दयाराम डोभाल की कुल सात संतानों में उमेश तीसरे थे. उनके पिता दयाराम डोभाल पौड़ी के पास कांडीखाल के एक अस्पताल में कंपाउंडर थे. उमेश का बचपन पौड़ी में ही बीता जहां डीएवी इंटर कॉलेज से 12वीं पास करने के बाद वो बीएससी करने श्रीनगर के बिड़ला परिसर पहुंचे. लेकिन बीएससी सेकेंड ईयर में ही उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और फिर गांव के पास स्थित क्यार्क स्कूल में पढ़ाने लगे. आगे चल कर उन्होंने कुछ समय तक पौड़ी और लैंसडाउन ट्रेजरी में भी काम किया. फिर साल 1975 में उमेश अपने बड़े भाई रमेश के पास चले गए जो उस वक्त लखनऊ में ‘इंडियन एयरोनॉटिक कैमिकल्स’ में रिप्रैजेंटेटिव के पद पर काम कर रहे थे. उन्हीं की मदद से उमेश को सैवी इंडस्ट्रीज में एकाउंटेंट की नौकरी भी मिल गई. लेकिन यहाँ भी उनका मन ज़्यादा समय नहीं लगा और एक साल बाद ही वो इस नौकरी को छोड़कर गांव वापस लौट गए.
कॉलेज के दिनों से ही उमेश सामाजिक मुद्दों पर लिखा करते थे और समाचार पत्रों को अपने लेख भेजा करते थे. जनता से जुड़े मुद्दों पर उनकी गहरी रूचि और पैनी नजर रहती. ऐसे में उन्होंने पत्रकारिता को अपने पेशे के तौर पर चुना. पौड़ी में उन दिनों ‘पौड़ी टाइम्स’ नाम से एक साप्ताहिक अखबार शुरु हुआ था. उमेश भी ‘पौड़ी टाइम्स’ के साथ काम करने लगे. अच्छे काम के कारण कुछ वक्त बाद ही उन्हें पौड़ी टाइम्स में उप संपादक बना दिया गया.
उमेश के छोटे भाई दिनेश डोभाल बताते हैं,
‘कुछ वक्त तक उन्होंने पौड़ी में सिविल लाइन थाने के पास विद्यार्थी पुस्तक भंडार नाम से एक दुकान भी खोली. इसी दुकान में बैठकर वो अपनी रिपोर्ट्स लिखा करते थे. उनकी इस दुकान में रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ भी पढ़ने आया करते थे. वो अक्सर मुझसे कहा करते थे कि किसी बच्चे को अगर कॉपी, पेंसिल, पेन, किताब आदि की जरूरत हो और उसके पास इसे खरीदने के पैसे न हों, तो बेझिझक यहां से ले जाना. करीब 2 से 3 साल उनकी ये दुकान चली. फिर वो पूरी तरह से पत्रकारिता करने में जुट गए. पौड़ी टाइम्स के बाद उन्होंने बिजनौर टाइम्स के लिए लिखना शुरु किया. उनका काम अब दिल्ली तक भी पहुंचने लगा था. दिल्ली नवभारत टाइम्स के संपादक सुरेंद्र प्रसाद ने फोन कर उन्हें दिल्ली बुलाया और नवभारत के उत्तर प्रदेश संस्करण में काम करने का प्रस्ताव दिया. इस तरह कई साल उन्होंने नवभारत टाइम्स के लिए भी काम किया. बाद में बम्बई से प्रकाशित चर्चित पत्रिका हिलांस के लिए भी उन्होंने कई लेख लिखे.’
साल 1986 से उमेश डोभाल अमर उजाला के साथ काम करने लगे. ये वो दौर भी था जब अमर उजाला पहाड़ में अपनी पकड़ बना ही रहा था. अख़बार को घुमक्कड़ और ऊर्जावान पत्रकारों की जरूरत थी. उमेश के मित्र सुरेश रावत बताते हैं कि गढ़वाल में जगह-जगह उमेश ने अमर उजाला की एजेंसी लगवाई. पहाड़ में इस अख़बार को स्थापित करवाने में उमेश डोभाल का अहम योगदान था.
अब उमेश सुदूर पहाड़ी गांवों-कस्बों में जा-जाकर रिपोर्ट्स लिखने लगे थे. गांव में कभी किसी छोटी-सी दुकान में बैठकर, कभी खेतों में काम कर रहे ग्रामीणों और चाची-बौडी के साथ गप्पें लड़ाते हुए, तो कभी लकड़ियां और घास लाते लोगों से बात कर उस जगह के हालातों को जानते-समझते और रिपोर्ट तैयार कर लेते. पीठ पर लदे उनके बैग के अंदर पेन, पेंसिल, सफेद कागज, लिफाफे और गोंद हमेशा होता. यही उनकी कुल-जमा पूँजी भी थी. पत्रकारिता उनके लिए एक व्यवसाय से कहीं ज्यादा एक मिशन बन चुकी थी. ऐसा मिशन जिसके लिए उन्होंने उस दौर के कुख्यात माफ़ियाओं के ख़िलाफ़ बेख़ौफ़ लिखा और जिसके चलते उनकी हत्या तक कर दी गई.
तारीख़ थी 25 मार्च 1988. इस दिन सिलसिलेवार तरीके से क्या कुछ हुआ, ये पूरा घटनाक्रम हम आपको उमेश डोभाल के भाई दिनेश डोभाल से बातचीत और उनके द्वारा उपलब्ध करवाए गए दर्जनों दस्तावेज़ों के आधार पर बता रहे हैं. इन दस्तावेज़ों में फ़ैक्ट-फ़ाइंडिंग समितियों की रिपोर्ट, पुलिस को दिए गए बयान और उस दौर में प्रकाशित हुई खबरों के साथ ही 80 के दशक का एक ऐसा लेख भी शामिल है जो तब की एक चर्चित राष्ट्रीय पत्रिका में एक कहानी के तौर से प्रकाशित हुआ था.
25 मार्च 1988. सुबह करीब साढ़े 8 बजे उमेश आम दिनों की तरह ही अपने गांव सिरोली से पौड़ी के लिए निकले. रोजाना की तरह कुछ घंटे रिपोर्टिंग के लिए यहां-वहां गए और फिर करीब एक बजे अपने पत्रकार साथी विमल नेगी और स्टेट बैंक में कार्यरत साथी राजू रावत से मिले. उमेश और राजू रावत ने उसी पायल होटल में चाय पी जो तब इन सभी साथियों के लिए बातचीत और विमर्श का प्रमुख अड्डा होता था. कुछ घंटे साथ बैठने के बाद करीब 3 बजकर 20 मिनट पर उमेश सन एंड स्नो होटल पहुंचे. इस होटल के कमरा नं. 10 में उनके लिए ठहरने की वैकल्पिक व्यवस्था होती थी. इसी दिन उमेश के बहनोई धीरेंद्र उनियाल भी उमेश से मिलने आने वाले थे. अगले दिन यानी 29 मार्च को धीरेंद्र के बच्चे का नामकरण था और वो उमेश को निमंत्रण देने आ रहे थे. शाम करीब पौने 6 बजे धीरेंद्र अपने भाई वीरेंद्र के साथ सन एंड स्नो होटल पहुंचे. कमरे का दरवाजा खुलते ही उन्होंने देखा कि उमेश के साथ एक और व्यक्ति मौजूद था. उमेश बेड पर थे और दूसरा व्यक्ति सामने रखे सोफे पर. उमेश ने उसका परिचय देते हुए उनसे कहा- ‘ये आर्य साहब हैं’. कुछ ही वक्त पहले उमेश और आर्य ने शराब पी थी. धीरेंद्र और वीरेंद्र वहां पहुंचे तो उनके लिए भी पैग बनाया गया. कुछ देर शराब पीने के बाद धीरेंद्र ने उमेश को रात का खाना उनके घर पर खाने के लिए कहा. लेकिन उमेश ने मना किया और कहा कि सुबह नाश्ता करने जरूर आपके घर पहुंचूंगा. इसके बाद धीरेंद्र और वीरेंद्र अपने घर लौट गए. उनके चले जाने के कुछ देर बाद मनमोहन नेगी वहां पहुंचा. उमेश की हत्या की साज़िश रची जा चुकी थी. कुछ देर बाद मनमोहन के साथी बलराज और राजेंद्र भी कमरे में दाखिल हुए और सभी बैठकर शराब पीने लगे. नशा जब गहराने लगा, तो बलदेव आर्य ने उमेश से कहा, ‘तुम हमारे पीछे क्यों पड़े हो? हमें अपना काम करने दो. तुम्हें पैसे चाहिए तो हमसे मांग लो.’ इस बात पर उमेश डोभाल बहुत ग़ुस्सा हुए और उन्होंने जवाब देते हुए कहा कि ‘मैं बिकने वाला पत्रकार नहीं हूं.’ इसके साथ ही उमेश ने सभी को कमरे से चले जाने को भी कहा. सब लोगों ने मिलकर उमेश को कुछ शांत किया. इतने में मनमोहन नेगी ने होटल के स्वीपर दिनेश वाल्मीकि को कमरे में बुलाया और कहा कि जब होटल के सारे लोग सो जाएं तो सारी लाइटें बुझाकर इस कमरे में आ जाना. फिर जब दिनेश वहां से चला गया तो मनमोहन नेगी और उसके साथियों ने उमेश को धक्का देते हुए बेड पर गिरा दिया और बलदेव ने अपने मफलर से उमेश का गला घोंट दिया. कुछ देर छटपटाने के बाद उमेश की साँसें थम गई. जिस वक्त इस वारदात को अंजाम दिया जा रहा था उस वक्त होटल के कर्मचारी बचन सिंह और जीत सिंह ये पूरा घटनाक्रम देख रहे थे. रात करीब साढ़े 11 बजे जब होटल में ठहरे सभी लोग सो गए तो मनमोहन नेगी के कहे अनुसार सारी लाइट्स बुझाकर दिनेश वाल्मीकि कमरे में पहुंचा. राजेंद्र और दिनेश को कमरे में ही छोड़कर मनमोहन, बलदेव और बलराज होटल से बाहर चले गए और कुछ देर बाद एक मारूति कार लेकर वापस लौटे. इस बीच दिनेश वाल्मीकि होटल के एंट्री गेट के पास सोए जय सिंह की चारपाई के पास लेट गया था. मनमोहन, बलदेव और बलराज कमरे में वापस पहुंचे और उन्होंने उमेश की लाश को उठाकर कार में रखा. होटल के गेट खुलने की आवाज से पास सोए जय सिंह की आंख खुल गई. उसने आवाज लगाते हुए कहा- कौन हो, क्या कर रहे हो? लेकिन मनमोहन नेगी ने उसे जान से मारने की धमकी दी और शांत करवा दिया. फिर उन लोगों ने उमेश की लाश को कार में डाला और वहां से निकल गए. अगले दिन यानी 26 मार्च को होटल के कर्मचारी बचन सिंह, जीत सिंह और जय सिंह ने होटल के मैनेजर राजेंद्र कपटियाल को पूरी घटना के बारे में बताया. कपटियाल ने होटल के मालिक शिवप्रसाद घिल्डियाल को फोन पर सारी सूचना दी. शिवप्रसाद, देहरादून में रहते थे. खबर सुनते ही वे उसी दिन पौड़ी पहुंचे और होटल स्टाफ के साथ मीटिंग की. उमेश डोभाल की हत्या हो चुकी है, इस बात को सबसे छिपाया गया. उमेश का शव भी बरामद नहीं हुआ था इसलिए इस दिशा में भी सिर्फ़ क़यास ही लगाए जाते रहे. हालाँकि मई 1994 में प्रकाशित हुई ‘पीपुल्स यूनियर फॉर डेमोक्रैटिक राइट्स’ की फैक्ट फाइंडिंग कमेटी की रिपोर्ट में इस बारे में काफी कुछ कहा गया था. रिपोर्ट के अनुसार,
‘मनमोहन नेगी और उसके साथी उमेश के शव और उनके सामान को एक सफेद मारूति कार में रखकर पौड़ी-श्रीनगर मार्ग पर चोपड़ा गांव के पास एक पुल तक ले गए और शव को वहां छिपा दिया. आरोपियों में दो पुलिसकर्मी भी शामिल थे, एसआई एसएस यादव और एसआई एसएस चौधरी. अगले दिन इन दोनों ने ही शव की देख-रेख के लिए एक होमगार्ड और एक कॉंस्टेबल की व्यवस्था की और शाम के वक्त उन्हें वहां से चले जाने को कहा. फिर मनमोहन नेगी और उसके साथी पुलिसवालों की सहायता से शव और सामान को डोभ श्रीकोट गांव के पास कहीं ले गए और पहले से खोदे हुए एक गड्ढे में शव को दफना दिया. इसके बाद उमेश डोभाल के अवशेष आज तक बरामद नहीं हो सके’
उमेश डोभाल की हत्या हो चुकी थी लेकिन ये बात पौड़ी शहर में अभी फैली नहीं थी. 26 मार्च की सुबह जब उमेश घर नहीं पहुंचे तो उनके बहनोई वीरेंद्र होटल आए. वहां देखा तो उनके कमरे में ताला लगा था. उन्होंने रिसेप्शन में जाकर मैनेजर राजेंद्र कपटियाल से पूछा तो उन्हें जवाब मिला कि उमेश तो सुबह ही चले गए थे. वीरेंद्र को ये बिलकुल सामान्य बात लगी क्योंकि उमेश अक्सर रिपोर्टिंग के लिए बिना किसी को बताए ही निकल जाया करते थे और कई-कई दिन बाद लौटते थे. अमर उजाला के लिए उनकी रिपोर्ट्स पौड़ी से कोटद्वार पहुंचती थीं और फिर कोटद्वार से टैक्सी में मेरठ तक. लगभग प्रतिदिन ही उनकी रिपोर्ट अख़बार में प्रकाशित होती थी. लेकिन इस बार जब कई दिनों तक अख़बार में उनकी लिखी कोई रिपोर्ट नहीं दिखी तो उनके घरवालों को चिंता होने लगी.
ऐसे में वीरेंद्र उनियाल ने 25 मार्च वाली बात घर पर सभी को बताई. अब तक शहर में भी लोगों के बीच दबी-जुबान ये चर्चा तेज होने लगी थी कि मनमोहन नेगी ने उमेश डोभाल को रातों-रात गायब कर उसकी हत्या कर दी है. उमेश की कोई खबर नहीं मिल रही थी. ऐसे में उनके बड़े भाई रमेश डोभाल ने नवभारत टाइम्स लखनऊ के संपादक पीएन थपलियाल, जनसत्ता के उपसंपादक मंगलेश डबराल और अमर उजाला मेरठ के ऑफिस को फोन करके उमेश के बारे में पूछताछ की. मगर किसी को भी उनके बारे में मालूम नहीं था. उमेश को खोजने की सारी कोशिशें नाकाम हो रही थी.
उमेश के परिवार वाले जब उनकी गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराने पौड़ी थाने पहुंचे तो पुलिस वालों ने भी शुरुआत में कोई रूचि नहीं दिखाई और कहा कि ‘वो एक शराबी और ड्रग एडिक्ट था, जो भाग गया है.’ मनमोहन नेगी का ख़ौफ़ ऐसा था कि प्रशासन भी उमेश डोभाल के लापता हो जाने को नज़रंदाज़ कर रहा था. लेकिन पत्रकार संगठन अब एकजुट होने लगे थे और उन्होंने 2 अप्रैल को पौड़ी में विशाल प्रदर्शन का आह्वाहन किया. इस प्रदर्शन में पत्रकार रमेश पहाड़ी और राज्य आंदोलनकारी शमशेर सिंह बिष्ट की भूमिका अहम थी. नैनीताल समाचार में प्रकाशित एक लेख में शमशेर सिंह बिष्ट लिखते हैं,
‘उमेश की हत्या की खबर अल्मोड़ा पहुंची, तो मैं पौड़ी के लिए चल पड़ा. 2 अप्रैल को पौड़ी में विशाल प्रदर्शन का आयोजन था. 1 अप्रैल को जब मैं पौड़ी पहुंचा तो पूरे शहर में सन्नाटा था. परिचितों को ढूंढ़ा तो कोई नहीं मिला. कुछ जाने-पहचाने चेहरे दूर से ही खिसक गए. बाद में शहर से 2 किलोमीटर दूर एक जूनियर इंजीनियर ने जगह दी. उसने पौड़ी में मनमोहन सिंह नेगी के आतंक के बारे में बताया. पता चला कि वो कांग्रेस से भी जुड़ा है और उन दिनों कांग्रेस एकमात्र ताकतवर पार्टी थी. अत: राजनीतिक रुप से भी उसे संरक्षण प्राप्त था. छात्र संघ भी शराब माफिया के साथ खड़ा था. मैं सोचने लगा कि इन हालातों में इनके विरोध में कोई आवाज उठेगी भी तो कैसे?’ 2 अप्रैल की सुबह सारा पौड़ी शहर मनमोहन सिंह नेगी के पक्ष में राजपूत संगठन के पोस्टरों से पट चुका था जिनमें मनमोहन नेगी के समर्थन में लिखा था – ‘माफिया नहीं मसीहा है’. प्रदर्शन के लिए धर्मानंद उनियाल, उमाशंकर थपलियाल, मोहन सिंह रावत गांववासी जैसे कुछ पत्रकार ही मौजूद थे. इस दौरान सन एंड स्नो होटल जहां उमेश की हत्या की गई थी, बाहर से आए भाड़े के गुंडों से भरा हुआ था. सभी डरे हुए थे. हमारे लोग कहने लगे कि इतनी कम संख्या में जुलूस निकालना फिजूल है. हम सोच ही रहे थे कि क्या करना है, तभी कुछ दूर से मनमोहन सिंह नेगी के खिलाफ लगते नारों की आवाज सुनाई दी. हजारों लोगों की ये आवाज धीमे-धीमे से तेज होती जा रही थी. उमेश के दोस्त राजेंद्र रावत राजू और ओंकार बहुगुणा उनके आगे-आगे चल रहे थे. राजेंद्र अपने गांव च्वींचा से ग्रामीणों को प्रदर्शन में शामिल होने के लिए लाए थे. जुलूस को देख सन एंड स्नो होटल के बाहर खड़े भाड़े के गुंडों और उनके इशारे पर काम कर रहे पुलिस अधीक्षक का साहस कुछ करने को नहीं हुआ. धीरे-धीरे कर पौड़ी शहर के कई लोग इस जुलूस से जुड़ते गए.’
जनता के भारी दबाव के बाद आखिरकार पुलिस ने उमेश डोभाल की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज की. कार्रवाई शुरु हुई तो पौड़ी के इंस्पेक्टर चौधरी ने उमेश के जीजा धीरेंद्र उनियाल को थाने बुलाकर उनसे आर्य का हुलिया पूछा, जो उस दिन उमेश के साथ कमरा नं. 10 में बैठा था. धीरेंद्र ने सब बताया. इसके बाद पता चला कि विकास मार्ग, पौड़ी पर वकील सुशील ममगांई के मकान में बलदेव सिंह नाम का एक व्यक्ति रहता है, जिसे लोग आर्य जी के नाम से जानते हैं. पुलिस जब वहां पहुंची तो धीरेंद्र और वीरेंद्र ने उसे पहचान लिया.
मई 1988 के दूसरे हफ्ते उमेश मामले की जिम्मेदारी पौड़ी सीओ मार्तुल्य को सौंपी गई. पौड़ी के पुलिस अधीक्षक बंशीलाल तब शहर से बाहर गए थे. सीओ मार्तुल्य ने मामले की तहकीकात करनी शुरु की. बलदेव आर्य से पूछताछ हुई तो उसने बताया कि 25 मार्च की शाम साढ़े सात बजे वो उमेश को उसके कमरे में शराब पीते छोड़कर चला गया था. मगर उसकी कही ये बात झूठी साबित हुई. कुछ दिन सीओ मार्तुल्य ने इस केस की छानबीन में काफी गंभीरता दिखाई, लेकिन जब पुलिस अधीक्षक बंशीलाल वापस लौटे तो पुलिस की कार्यवाही फिर से शांत पड़ गई.
एसपी बंशीलाल को लेकर ये किस्सा भी चर्चाओं में था कि उन दिनों लखनऊ के अलीगंज में वे अपना मकान बनवा रहे थे. इसके लिए उन्होंने पौड़ी सिविल लाइन थाने के पास मौजूद तून के पेड़ को कटवा दिया था. पेड़ की इन लकड़ियों को मनमोहन सिंह नेगी ने ही अपने ट्रक से लखनऊ पहुंचाया था.
एक महीने का वक्त बीत चुका था और उमेश डोभाल का कोई अता-पता नहीं था. सरकार की ओर से भी कोई बयान नहीं आया था. इस बीच लोगों में उमेश को लेकर झूठ भी फैलाया जाने लगा. तमाम पत्रकार जहां उमेश डोभाल मामले में जांच की मांग कर रहे थे वहीं, कुछ अखबार उमेश को लेकर झूठी खबर फैलाने में लगे थे. मई माह के दूसरे सप्ताह में ‘पौड़ी टाइम्स’ में एक खबर छपी थी जिसमें लिखा था कि उमेश डोभाल पर स्टेट बैंक का 23 हजार रुपए का ऋण था. रुपए देने में वो असमर्थ था, इसलिए वो असम, बिहार या नेपाल की ओर कहीं भाग गया. ‘पौड़ी टाइम्स’ ने अपने अगले संस्करण में उमेश मामले को लेकर एक और खबर छापी. इसमें पौड़ी चिकित्सालय में कार्यरत फॉर्मासिस्ट कीर्ति सिंह रावत की बेटी तृप्ति रावत का बयान छापा गया था. तृप्ति का कहना था कि उसने उमेश को 4 अप्रैल की शाम श्रीनगर में एक नाई की दुकान में देखा था. उसकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी. इस खबर के छपने से लोगों में ये संदेश गया कि उमेश डोभाल ज़िंदा हैं और 25 मार्च को पौड़ी के होटल में उनकी हत्या होने की बात झूठ है. दिनेश डोभाल बताते हैं, ‘जब पौड़ी टाइम्स में ये खबर छपी तो मैं उनके दफ़्तर पहुंचा था और उन पर मानहानि का मुकदमा दर्ज कराने की बात कही. मगर तब राजू भाई ने मुझे रोक लिया.’
ये भी दिलचस्प था कि पौड़ी टाइम्स वही पत्रिका थी, जिसके साथ उमेश ने पत्रकारिता की शुरुआत की थी लेकिन अब वही पत्रिका उमेश डोभाल के बारे में भ्रम फैलाने का काम कर रही थी. बहरहाल, कुछ वक्त बाद तक ये साफ हो गया कि उमेश की हत्या हो चुकी है. जनता के भारी दबाव के चलते तब 3 मई 1988 को पुलिस ने आईपीसी की धारा 364 के तहत मामला दर्ज किया.
मनमोहन नेगी की स्थानीय प्रशासन में पकड़ ऐसी थी कि मामला दर्ज होने के बाद भी न्याय मिलने कोई ख़ास उम्मीद लोगों को नहीं थी. ऐसे में पत्रकार संगठनों ने मिलकर इस मामले की जाँच CBI से करवाने की मांग उठाई. ‘उमेश डोभाल खोजो संघर्ष समिति’ का गठन किया गया जिसके नेतृत्व में 6 मई 1988 को पौड़ी में प्रदर्शन हुआ. इस प्रदर्शन में पहली बार स्थानीय लोग शामिल हुए. इस दौरान प्रधानमंत्री को ज्ञापन भेजकर मामले की सीबीआई जांच कराने की मांग की गई.
इसके 5 दिन बाद 11 मई 1988 को श्रीनगर में डालमिया धर्मशाला में बैठक हुई. इसमें गढ़वाल और कुमाऊं के 72 पत्रकार शामिल हुए. इस बीच कर्मभूमि के संपादक शरद चंद्र धूलिया सहित कुछ अन्य पत्रकारों को धमकी भरे पत्र भी पहुंचे जिनमें लिखा था, ‘यदि पत्रकार संघर्ष समिति का साथ दिया तो तुम लोगों को भी उमेश डोभाल के बगल में सुला दिया जाएगा.’
कुछ दिन बाद एक बैठक टिहरी में भी होने वाली थी. इसका जिम्मा सरदार प्रेम सिंह के पास था लेकिन उन्हें भी धमकी मिली तो वे घबरा गए. बाद में बच्चीराम कौंसवाल के सहयोग से टिहरी में मीटिंग की गई. माफिया के डर से समिति के सह-संयोजक कुंज बिहारी नेगी ने भी अपने पद से इस्तीफा दे दिया था. बाद में शमशेर सिंह बिष्ट को ये जिम्मेदारी दी गई.
23 मई 1988 को संघर्ष समिति की बैठक में ये तय हुआ कि 3 जून को पौड़ी में फिर से एक विशाल प्रदर्शन और जनसभा आहूत की जाए. स्थानीय लोगों, सामाजिक संगठनों और देश-प्रदेश के तमाम पत्रकारों को इसमें बुलाया जाए. माफिया को भी इस बात की खबर लग चुकी थी. पत्रकार समिति के संयोजक रमेश पहाड़ी जब अन्य पत्रकार साथियों के साथ पौड़ी बस अड्डे पर पहुंचे तो माफिया गैंग वहां पत्रकारों को डराने-धमकाने लगे. इसके अलावा उन पर पत्थर बरसाने की भी तैयारी की गई थी. वो नारे लगा रहे थे, ‘पीत पत्रकारों वापस जाओ.’ पत्रकारों के खिलाफ नारे लगाने वालों में जगमोहन सिंह नेगी, राजेंद्र सिंह रावत, पृथ्वीपाल सिंह और बलदेव आर्य प्रमुख थे. इस स्थिति में उनके आतंक के कारण किसी भी तरह के प्रदर्शन की उम्मीद नहीं बन पा रही थी. तब छात्र संघ भी माफियाओं के समर्थन में था. इस दौरान बाहर से जो लोग प्रदर्शन में शामिल होने पहुंचे थे उन्हें ठहरने के लिए जगह मिलना भी कठिन हो रहा था. इन बीते एक-दो दिन में उमेश के मित्र ओंकार बहुगुणा और राजू रावत ने ग्रामीणों को जुलूस के लिए तैयार किया. आसपास के गांवों में जाकर उन्होंने पर्चे बांटे और लोगों से आंदोलन में शामिल होने का आह्वाहन किया. 3 जून 1988 को हुए व्यापक प्रदर्शन के बाद आंदोलन और भी ज्यादा मजबूत होता गया. लेकिन पौड़ी में भारी जुलूस को देखकर मनमोहन ने स्थानीय लोगों को और ज्यादा डराना शुरु कर दिया. इसके साथ ही लोगों को ब्राह्मण-राजपूत के नाम बांटने की कोशिशें भी तेज हुई. हालांकि ये कोशिश नाकाम रही और मनमोहन नेगी के गांव के लोगों ने भी इस आंदोलन में हिस्सा लिया.
30 जून को दिल्ली के बोट क्लब में भी पत्रकार संघर्ष समिति का विशाल प्रदर्शन हुआ और राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को 385 पत्रकारों ने ज्ञापन दिया. लोकदल के राष्ट्रीय अध्यक्ष हेमवती नंदन बहुगुणा, विधायक पुष्कर सिंह रौथाण, पौड़ी के ब्लॉक प्रमुख रामदयाल पटवाल आदि सहित विभिन्न नेताओं, सामाजिक एवं व्यापारिक प्रतिनिधियों तथा आम जनता ने माफिया तंत्र के खिलाफ पत्रकारों के संघर्ष को भरपूर समर्थन दिया.
इस हत्याकांड की चर्चाएं पहाड़ समेत पूरे यूपी में तो हुई ही, देश के अलग-अलग हिस्सों में भी ये मामला खूब हाइलाइट हुआ. दिल्ली में प्रेस क्लब से लेकर जंतर-मंतर तक उमेश के पक्ष में आंदोलन हुआ. पौड़ी में कर्मचारी संगठनों ने धरना दिया. मेरठ के पत्रकारों ने डीएम ऑफिस के बाहर प्रदर्शन किया. देहरादून में भी पत्रकारों ने काली पट्टी बांधकर विरोध दर्ज किया. लखनऊ में करीब 300-400 पत्रकारों ने आंदोलन किया. भोपाल, चंडीगढ़, गाजियाबाद में भी पहाड़ के एक पत्रकार की हत्या के खिलाफ प्रदर्शन हुए.
वरिष्ठ पत्रकार सुरेश नौटियाल एक लेख में लिखते है –
पौड़ी से लेकर दिल्ली तक मनमोहन नेगी का खौफ था. दिल्ली में हमें भी मनमोहन सिंह की ओर से धमकियां मिलतीं कि उमेश डोभाल हत्याकांड की जांच सीबीआई से कराने की मांग छोड़ दो. हम डरे नहीं क्योंकि हम दुश्मन की औकात और दिल्ली में उसके लोगों को पहचानते थे. इन लोगों में से कुछ बाद में उत्तराखंड आंदोलन के स्वयंभू झंडाबरदार भी बने. खैर, वरिष्ठ पत्रकार भारत भूषण की मदद से हमने प्रधानमंत्री राजीव गांधी के नाम ज्ञापन तैयार किया. पत्रकार मृणाल पांडे ने उसमें कुछ संशोधन किए और मैं पत्रकार किशोर नैथानी के साथ चल पड़ा ज्ञापन पर पत्रकारों के हस्ताक्षर इकट्ठा करने. करीब 600-700 रुपए भी इकट्ठा हो गए थे. तब ये रकम ठीक-ठाक होती थी. एक दिन फिर धमकी हम तक पहुंची कि मनमोहन का विरोध करना छोड़ दो. इस पर दिल्ली यूनियन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट के महासचिव प्रदीप सौरभ खूब भड़के थे और उन्होंने मनमोहन सिंह को खुलकर मैदान में आने की चुनौती दे डाली थी. इससे हमारा उत्साह बढ़ गया. अंतत: वोट क्लब पर रैली हुई. सैकड़ों पत्रकार और राजनीतिक कार्यकर्ता इसमें आए थे. हेमवती नंदन बहुगुणा भी आए थे. डोभाल हत्याकांड की जांच सीबीआई से कराने की मांग संबंधी ज्ञापन प्रधानमंत्री कार्यालय पहुंचाया गया और सरकार ने सीबीआई जांच के आदेश दिए.
कुछ वक्त बाद जांच को सीबीआई को सौंपने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई. 9 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने ये केस सीबीआई को सौंप दिया. सीबीआई की चार्जशीट में इस बात का ज़िक्र था कि उमेश डोभाल, मनमोहन सिंह नेगी के माफियाराज के बारे में एक रिपोर्ट लिखने वाले थे. इसमें ये भी कहा गया कि 20 मार्च 1988 को उमेश डोभाल के मर्डर की प्लानिंग कोटद्वार में ही एक आरोपी के घर पर की गई थी.
इस बीच आरोपियों द्वारा गवाहों को डराया-धमकाया भी जा रहा था. कोर्ट ने इस बात को गंभीरता से लिया. ऐसे में सीबीआई की जांच शुरु हो जाने के बाद मामले में मुख्य आरोपी मनमोहन सिंह नेगी, उसके साथी बलदेव, बलराज और राजेंद्र रावत को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक तड़ीपार करते हुए बदर भेज दिया गया था. उत्तरप्रदेश हाईकोर्ट ने भी मनमोहन नेगी और उसके साथी बलदेव सिंह को सुनवाई की तारीखों के अलावा मुकदमे के वक्त गढ़वाल में एंट्री पर बैन लगा दिया था. आरोपी राजेंद्र रावत लैंसडौन के तत्कालीन विधायक का बेटा था. बलराज, ऱिटायर्ड फौजी था और हिमाचल का रहने वाला था. वो पौड़ी के हीरालाल ट्रांसपोर्टर के यहां नौकरी करता था, लेकिन उसका असल धंधा हेरोइन सप्लाई करना था. एक बार मुरादाबाद पुलिस ने उसे 2 किलोग्राम हेरोइन के साथ पकड़ा था. तब मनमोहन नेगी ने ही उसे छुड़ाया था. तभी से वो उसके साथ जुड़ गया.
इस मामले में कुछ पुलिसकर्मियों की संलिप्तता की भी जांच हुई. माफियाओं के खौफ से कई लोग गवाही देने से कतराते रहे. आरोपियों पर भारतीय दंड संहिता की धारा 302 यानी हत्या, 102 (बी) यानी आपराधिक साजिश और 201 यानी साक्ष्यों को गायब करने के तहत चार्जशीट दाखिल की गई थी. मार्च 1989 में केस में शामिल आरोपी रंजीत सिंह, दिनेश बाल्मीकि, राजीव नेगी, सुभाष रावत, गणेश डबराल, बंशीधर बहुगुणा और श्याम लाल को जमानत पर रिहाई मिल गई थी. करीब 5 पांच साल तक ये केस पेंडिंग रहा. फिर 12 अप्रैल 1994 को सीबीआई के विशेष मजिस्ट्रेट स्वतंत्र सिंह ने 95 पेजों के फैसले में सबूतों के अभाव में 13 आरोपियों को बरी कर दिया. एक पत्रकार की हत्या के बाद देश भर में भारी जनाक्रोश था, इसके बावजूद मनमोहन नेगी और उसके साथी बरी हो गए थे. ऐसे में माफिया गैंग के हौंसले औऱ भी ज्यादा बुलंद हो गए.
बलदेव, मनमोहन का खास दोस्त था. वो अक्सर उससे कहा करता था – ‘इटली के माफियाओं की तरह हत्या के बाद डेडबॉडी गायब कर दो. इससे कोर्ट में हत्या साबित करना मुश्किल हो जाता है’. नियति देखिए कि आगे चलकर बलदेव ने इसी तरह मनमोहन नेगी की हत्या को अंजाम दिया और मनमोहन सिंह नेगी का शव भी कभी बरामद नहीं हो सका. वक्त के साथ शराब माफियाओं का ये गैंग आपसी टकराव में ही लड़कर खत्म हो गया. इसके बाद पौंडी चड्ढ़ा जैसे माफियाओं ने पहाड़ में दस्तक दी और जगह-जगह शराब के ठेके खुले.
बहरहाल, उमेश डोभाल के लिए लड़ी गई इस लड़ाई में उनके दोनों साथी राजू रावत और ओंकार बहुगुणा मजबूती के साथ आंदोलन में जुटे रहे. उमेश डोभाल, राजेंद्र रावत और ओंकार बहुगुणा तीनों में गजब की दोस्ती थी. राजू रावत एक ट्रेड यूनियन नेता थे और स्टेट बैंक में काम करते थे. वो उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी से भी जुड़े हुए थे. जबकि ओंकार बहुगुणा की श्रीनगर में अमित न्यूज एजेंसी थी. शहर के जनांदोलनों में उनकी हमेशा भागीदारी रहती.
वरिष्ठ पत्रकार गोविंद पंत राजू बताते हैं, ‘राजू रावत और ओमकार बहुगुणा मनमोहन सिंह नेगी की गुंडागर्दी का विरोध करते रहते थे जबकि मनमोहन नेगी चाहता था कि ये लोग उसके साथ मिल कर रहें और उसके समर्थक बन जाएं. राजू भाई और मामू की तिकड़ी उस वक्त पौड़ी में हर दुख दर्द का समाधान मानी जाती.’
ओंकार बहुगुणा की बेटी रश्मि बहुगुणा कापड़ी उमेश डोभाल से जुड़ी यादों को साझा करते हुए बताती हैं,
‘उमेश भाई और पापा की मुलाकात आंदोलनों के दौरान ही हुई. पापा को लोग ‘मामू’ कहकर बुलाते थे. उमेश भाई हमारे घर पर आते-जाते रहते थे. बचपन में वो मुझे पढ़ाते भी थे. मैं कई बार उनके गांव सिरोली भी गई थी. कागज से एयरोप्लेन बनाना उमेश भाई ने ही मुझे सिखाया था. मेरा होमवर्क करवाने में वो खूब मदद करते थे. उन्हें खाना बनाने का भी शौक था. मैं बारह-तेरह साल की थी, जब उमेश भाई की हत्या की गई. उनके जाने के बाद हमारा परिवार काफी मुश्किलों में रहा. मामले की जांच के दौरान मनमोहन नेगी के लोग कभी घर पर पत्थर फेंक देते, तो कभी धमकी भरे पत्र हमारे घर पर आते. अक्सर पापा देर रात से घर पहुंचते थे. ऐसे में कई बार उन्हें बीच रास्ते में ही रोक कर डराया-धमकाया जाता. उमेश भाई के जाने के बाद जब केस की जांच चल रही थी, तो अखिलेश त्यागी नाम का मेरठ निवासी एक शख्स हमारे घर आया था. वो कई दिनों तक हमारे घर पर ही रहा. वो पैसे देकर मामले में चुप रहने के लिए पापा को मनाता रहा. इस दौरान एक बंदूक भी उसके पास थी. मगर कुछ वक्त बाद वो खुद ही वापस चला गया.
मनमोहन सिंह नेगी की गुंडई से जुड़ा एक किस्सा याद करते हुए राजू रावत की पत्नी बबली रावत बताती हैं –
मालरोड पर एजेंसी के पास मन्नू और च्वींचा गांव के प्रभुदयाल के बीच गोलीबारी हुई थी. पैर में गोली लगने से प्रभुदयाल को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था. राजू रावत जी ने इसकी शिकायत पुलिस से की थी. तब मनमोहन नेगी और उसके साथी कुछ वक्त जेल में रहे थे. मनमोहन इस बात को लेकर खुंदक में था. फिर एक दिन जब राजू रावत जी कैश लेने बैंक की गाड़ी से कोटद्वार गए तो रास्ते में मनमोहन और उसके एक साथी ने राजू जी को किडनैप कर लिया. उनके साथ मारपीट की और उनकी आंखों में पट्टी बांध दी. मगर राजू जी ने उन्हें आवाज से पहचान लिया था. उन दोनों में से एक मनमोहन नेगी था और दूसरा भारत नाम का कोई शख्स. मनमोहन ने राजू रावत को भाबर के जंगलों में कहीं छोड़ दिया और बाइक से जाने लगा. फिर कहा कि जब तक बाइक की आवाज सुनाई दे रही है, तब तक आंखों की पट्टी मत खोलना. राजू जी के साथ जो गार्ड मौजूद था, उसकी भी पिटाई की गई. बाद में उसी गार्ड ने ये खबर परिजनों तक पहुंचाई. राजू जी ने ये भी कहा कि ओंकार बहुगुणा और उमेश डोभाल को मत भेजना, क्योंकि उन्हें पता था कि मनमोहन घात लगाए बैठा है. लेकिन मना करने के बावजूद ओमकार बहुगुणा वहां पहुंचे. उनके साथ गांव के ही हरीश चंदोला भी थे. गुमखाल के पास जंगलों में उन्होंने ओंकार और हरीश जी को पकड़ लिया. ओंकार बहुगुणा की लहुलुहान होने तक पिटाई की. उनके सिर और पैर पर बहुत चोटें आईं. हालांकि इस बीच मनमोहन ने उनके साथ आए हरीश चंदोला को इसलिए छोड़ दिया क्योंकि उनके घर में कुछ ही दिन पहले कोई बच्चा हुआ था. मनमोहन नेगी के साथ पहुंचे भारत को गांव वालों ने बाद में खूब पीटा. मगर मनमोहन नेगी का आंतक इस घटना के बाद और बढ़ गया था.
उमेश डोभाल की हत्या के बाद राजू रावत और ओंकार बहुगुणा ने जिस तरह संघर्ष किया, वो बिलकुल भी आसान नहीं थी. मनमोहन नेगी के गुर्गों ने उन्हें कई तरीक़ों से परेशान किया. वरिष्ठ पत्रकार विमल नेगी एक लेख में लिखते हैं,
‘उमेश डोभाल की हत्या के बाद जब राजू रावत और ओंकार मामू मजबूती के साथ उन्हें न्याय दिलाने में जुटे रहे तो पुलिस उमेश मर्डर केस के साथ-साथ लोअर बाजार में हुए बड़थ्वाल हत्याकांड मामले में भी इन्हीं को लपेटने का मन बना चुकी थी. उस समय शऱाब माफिया से पुलिस को प्रतिमाह भारी रकम अपने अवैध धंधों को जारी रखने के एवज में दी जाती थी. सी.बी.सी.आई.डी. की जांच में भी ओंकार मामू को फंसाए जाने की योजना थी. राजू भाई और ओंकार मामू अगर सक्रिय नहीं होते तो उमेश हत्या की कहानी कुछ और होती.’
उमेश डोभाल को याद करते हुए उनके छोटे भाई दिनेश डोभाल ने भी बारामासा से कुछ यादें साझा की. दिनेश 1983 में भारतीय सेना की ग्यारहवीं गढ़वाल बटालियन में शामिल हुए थे. वो बताते हैं,
‘आर्मी में रहते हुए मैंने कारगिल और आईपीकेएफ में श्रीलंका में भी काम किया. एक बार मैं कारगिल से एक जैकेट उमेश भाई के लिए लाया था. मगर कुछ ही दिन बाद उन्होंने वो जैकेट गांव के रास्ते में ठंड से ठिठुर रहे किसी शख्स को बिना कुछ सोचे समझे दे दी. उन्हें कुछ लोग ‘काका’ कहकर भी बुलाते थे.जब उमेश भाई गुमशुदा हुए तो मैं उस वक्त ऑपरेशन पवन के तहत श्रीलंका के जाफना में था. एक दिन हमारे मैनेजर द हिंदू में कोई खबर पढ़ रहे थे, इसमें एक पत्रकार की गुमशुदगी के खिलाफ पहाड़ में हो रहे प्रदर्शनों की खबर थी. खबर पढ़ने के बाद उन्होंने मुझे बुलाया और इस बारे में बताया. कुछ वक्त के लिए विश्वास ही नहीं हुआ. कुछ वक्त बाद मैं दिल्ली आ गया और फिर लैंसडाउन. जब श्रीलंका में था तो उमेश मुझे लगभग हर हफ्ते चिट्ठी भेजा करते थे. इस दौरान उन्होंने जंग की, युद्ध के मैदान की और सेना की बटालियन पर भी कविताएं लिखीं. उनकी गुमशुदगी का मामला तब इतना चर्चित हुआ था कि इसके बारे में वॉशिंगटन पोस्ट और न्यूयॉर्क टाइम्स में भी खबर छपी थी. जिसमें लिखा गया था कि उमेश डोभाल दुनिया के 27 वें ऐसे पत्रकार हैं जिन्हें माफियाओं द्वारा मारा गया है. ये भारत का ऐसा पहला केस था जो किसी पत्रकार की हत्या की वजह से सीबीआई को रेफर हुआ था.’
दिनेश आगे बताते हैं कि…
‘तब न सिर्फ शराब का अवैध व्यापार हो रहा था बल्कि नेपाल से अन्य तरह के नशीले पदार्थों की भी तस्करी गढ़वाल के कई इलाकों में हो रही थी. उमेश भाई को इन सब के बारे में मालूम था. वो माफियाओं के इन काले कारनामों पर रिपोर्ट लिखने वाले थे. मगर इससे पहले ही उनकी हत्या कर दी गई. उमेश भाई की लिखी हजारों रिपोर्ट्स की कटिंग सीबीआई वाले ले गए थे. बाद में जब हमने उन्हें वापस मांगना चाहा तो उन्होंने हमसे कहा कि उन्हें दीमक खा गए. बाद में मैं देहरादून के आराघर में मौजूद सीबीआई के क्षेत्रीय दफ्तर में भी गया था, तब भी उन्होंने कोई इंट्रेस्ट नहीं दिखाया.’
उमेश डोभाल की हत्या के बाद माफ़ियाओं के दबाव में उमेश को कई तरीक़ों से बदनाम करने का भी सिलसिला चलाया गया. वरिष्ठ पत्रकार गोविंद पंत राजू बताते हैं,
‘मनमोहन गैंग, उमेश को कई बार कैश भी ऑफर कर चुका था. मगर उन्होंने अपनी कलम से कभी समझौता नहीं किया. जब उमेश की हत्या हुई तो ये झूठ भी फैलाया गया कि उमेश पर बैंक का काफी कर्जा था. बहन की शादी नहीं हो रही थी, इसलिए वो फ्रस्ट्रैशन में था और खुद ही भाग गया.’
चर्चित लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी भी उमेश डोभाल के करीबी रहे थे. नैनीताल समाचार के जनवरी 2010 के अंक में उन्होंने उमेश को याद करते ‘दगड्या, दगडू नि रैणो सदानी’ नाम से एक लेख भी लिखा. इसमें जिक्र है कि –
‘1988 की नंदा राजजात यात्रा में उमेश, राजू और मैं कुछ पड़ावों तक गए. मैं जहां राजजात के सांस्कृतिक पक्षों की तलाश में जुटा रहा, राजू और उमेश राजजात में महिलाओं और अनुसूचित जातियों के निषेध परम्पराओं पर स्थानीय लोगों से चर्चा और बहस में उलझे रहे.’
इस लेख में वो उस किस्से को भी याद करते हैं जब वो और राजू रावत उमेश डोभाल को एक लड़की से मिलाने ले गए. नरेंद्र सिंह नेगी लिखते हैं –
‘एक बार पौड़ी में राजू ने मुझसे कहा, “नरू भाई ! उमेश के लिए लड़की देखनी है. श्रीनगर चलना है” हम दोनों उमेश को लेकर राजू के बैंक सहकर्मी पी.एल. पांडे जी के घर श्रीनगर पहुंचे. पांडे जी ने लड़की को किसी बहाने घर बुलाया और जैसे ही उमेश डोभाल से लड़की का परिचय कराया, वह साजिश समझकर कमरे से बाहर निकल गया और फिर लौट कर नहीं आया. उमेश को गृहस्थ बनाने के हमारे इस असफल प्रयास के कुछ महीने बाद ही शराब माफिया द्वारा पौड़ी में उमेश की हत्या कर दी गई. उमेश की हत्या के बाद राजू के आग्रह पर ही मैं उमेश डोभाल स्मृति ट्रस्ट से जुड़ा.’
राजू रावत, उमेश को चौबीस घंटों का पत्रकार बताते थे. वो कहते थे कि उमेश ने घोर आर्थिक तंगी के बीच भी पत्रकारिता को कभी जुगत या जीवन जीने का शॉर्टकट नहीं बनाया था. उमेश कहता था मेरा परिचय सियासी या शासन के उच्च पद पर बैठे व्यक्तियों से बतौर पत्रकार मत करना.
वरिष्ठ पत्रकार क्रांति भट्ट के अनुसार, ‘एक रात जब बिजली नहीं थी, तो उसने माचिस की तिल्लियों की रोशनी में खबर लिखी थी और पौ फटने से पहले अंधेरे में ही ऋषिकेश जाने वाली रोडवेज की बस में मेरठ भेज दी.’
उमेश डोभाल आज के दौर में उन तमाम पत्रकारों के लिए मिसाल हैं जो सत्ता की गोद में बैठ कर पत्रकारिता के असल मायने भूल चुके हैं. 25 मार्च को हर साल उत्तराखंड में उमेश डोभाल को याद करते हुए एक नारा बुलंद किया जाता है – ‘उमेश डोभाल एक व्यक्ति नहीं, एक धारा थी एक धारा है.’
25 मार्च 1991 को उमेश डोभाल स्मृति समिति गठित की गई. साल 2002 में इसे ट्रस्ट का रूप दे दिया गया और पत्रकारिता, कला, साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में बेहतर काम करने वाली शख्सियतों को हर साल पुरस्कृत किया जाने लगा. 2009 में जब समिति और ट्रस्ट के संस्थापक राजेंद्र रावत का निधन हो गया, तो उनके नाम पर 2010 से जनसरोकार सम्मान दिया जाने लगा. साल 2011 से ट्रस्ट द्वारा जनकवि गिरीश तिवाड़ी गिर्दा की स्मृति में जनकवि सम्मान भी दिया जाता है.
उमेश डोभाल को कविताएं लिखने का भी शौक था. अपनी एक कविता में वो लिखते हैं,
मैंने जीने के लिए हाथ उठाया
और वह झटक दिया गया
मैंने स्वप्न देखे
और चटाई की तरह अपनों के बीच बिछा
उठा कर फेंक दिया गया
अंधेरी भयावह सुरंग में …
मैंने वहां भी रोशनी तलाश की
अब मैं मार दिया जाऊंगा
उन्हीं के नाम पर
जिनके लिए संसार देखा है मैंने…
स्क्रिप्ट: अमन रावत