क्रांति में बदल गई जब एक शव यात्रा

  • 2022
  • 7:56

15 जनवरी. एक ऐसी तारीख़ जिसके नाम कई ऐतिहासिक घटनाएं दर्ज हैं. 1934 में इसी तारीख को बिहार और नेपाल के सीमावर्ती इलाकों में भूकंप आया था जिसमें 11 हजार लोगों की मौत हुई. 1998 में इसी तारीख को देश के पूर्व कार्यकारी प्रधानमंत्री गुलजारीलाल नंदा का निधन हुआ था. 2010 में इस तारीख को शताब्दी का सबसे लंबा सूर्य ग्रहण लगा. और 1948 में इसी तारीख़ को सदियों से गुलामी झेल रही एक हिमालयी रियासत आजाद हुई.

भारत के उत्तरी छोर पर चीन सीमा से लगती एक रियासत ने इस दिन सैकड़ों साल पुराने गुलामी और सामंतवाद के तख्त को उखाड़ फेंका था. एक ऐसी रियासत जिसने भारत की आज़ादी के बाद लगभग दो साल तक स्वतंत्र देश के रूप में सरकार चलाई और फिर एक अगस्त 1949 को भारत में विलय किया. 15 जनवरी टिहरी गढ़वाल रियासत की सामंतवाद से आजादी का भी दिन है. 

15 जनवरी 1948 के दिन टिहरी गढ़वाल की जनता द्वारा किए गए तख्तापलट का दिन है. रजवाड़े परमार वंश का एक आम परिवार बन जाने का दिन और और रियासत की जनता के खास बन जाने का दिन. 15 जनवरी के दिन ही टिहरी आजाद हुआ था और इसकी आज़ादी की लड़ाई की पटकथा में सबसे निर्णायक मोड़ आया था ठीक चार दिन पहले यानी 11 जनवरी 1948 के दिन. 

राहुल सांकृत्यायन अपनी किताब ‘वीर चंद्र सिंह गढ़वाली’ में लिखते हैं कि श्रीनगर में अलकनंदा के दूसरी ओर कीर्तिनगर से टिहरी रियासत की सीमा शुरू होती थी. यहां टिहरी के राजा के खिलाफ आंदोलन कर रही ‘प्रजा परिषद’ के कुछ नेताओं को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था. इससे जनता में भारी गुस्सा था. इसकी सूचना जब कामरेड नागेंद्र सकलानी और मोलू भरदारी को मिली तो वे तुरंत मौके पर पहुंचे. सकलानी ने पहुंचते ही भोंपू पर बोलना शुरू किया और फिर सभा की शुरुआत हुई.

इसके कुछ ही समय बाद कीर्तिनगर की कचहरी पर अधिकार कर लिया गया और कस्बे में जनता की सरकार स्थापित होने की घोषणा कर दी गई. राजा के अधिकारियों को जनता ने बंधक बना लिया. टिहरी के राजा नरेंद्र शाह उस वक्त टिहरी में अपने महल में थे. उन्हें इसकी सूचना मिली तो उन्होंने एसडीओ और पुलिस अधीक्षक को भारी पुलिस बल के साथ मौके पर रवाना किया. लेकिन जनता अब क्रांति का मोर्चा संभाल चुकी थी. तमाम सिपाही बंधक बना लिए गए थे. एसडीओ और पुलिस अधीक्षक ने ये नजारा देख तो वे जंगल की ओर भागे. नागेंद्र सकलानी और मोलू भरदारी उनके पीछे भागे तो एसडीओ ने दोनों पर गोली चला दी. दोनों क्रांतिकारियों की वहीं शहादत हो गई. 

नागेंद्र सकलानी और मोलू भरदारी की शहादत की खबर सुनकर जनता मायूस होने लगी. लेकिन क्रांति दिशाहीन न हो, इसके लिये पेशावर कांड के नायक चंद्र सिंह गढ़वाली तुरंत पौड़ी से कीर्तिनगर पहुंचे. उन्होंने एक भोंपू अपने हाथ में लिया और जनता से बोले, ‘मैं चंद्र सिंह गढ़वाली हूं. नागेंद्र सकलानी और मोलू भरदारी की शहादत हमारी अंतिम शहादत हैं. गढ़वाल में तेरह सौ साल का ये सामंती गढ़ अब इन शहादतों के सामने टिक नहीं पाएगा.’ 

चंद्र सिंह गढ़वाली आहवान कर ही रहे थे कि वहां मौजूद पुलिस के सभी सिपाहियों ने अपने हथियार झुका लिये और इस जन-क्रांति में शामिल हो गये. तय किया गया कि दोनों शहीदों के शवों को एसडीओ की गाड़ी में रख कर टिहरी की तरफ़ कूच किया जाये. क्रांतिकारियों का ये क़ाफ़िला देवप्रयाग होते हुए 15 जनवरी को टिहरी पहुंचा. गांव-क़स्बे-बाजार जहां-जहां से भी ये यात्रा गुजरी, पुलिस के सिपाही अपने हथियार डालते गये और जनता घरों निकल कर इस जुलूस का हिस्सा बनती चली गई. क्या बुजुर्ग, क्या नवजवान, क्या महिलायें और क्या बच्चे. सभी टिहरी की तरफ बढ़ने लगे.

15 जनवरी को क़ाफ़िला टिहरी पहुंचा. अब तक इस क़ाफ़िले में हथियारबंद सुरक्षाकर्मी भी शामिल हो चुके थे. ये वही हथियारबंद सुरक्षाकर्मी थे, जो कभी गढ़वाल राइफल के योद्धा थे और बाद में आजाद हिंद फौज में शामिल हो गये थे. इन्हें पता चला कि उनका नेता चंद्र सिंह गढ़वाली इस क्रांति का नेतृत्व कर रहा है तो वो सभी अपने हथियार लेकर एक सुरक्षा प्लाटून के रूप में क्रांति के भागीदार हो गए थे.  

तय किया गया कि दोनों शहीदों का अंतिम संस्कार राजघाट किया जाएगा. नागेंद्र सकलानी और मोलू भरदारी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य थे. लिहाज़ा जब चंद्र सिंह गढ़वाली उनकी चिताओं को अग्नी दे रहे थे तो परिपूर्णानंद पैन्यूली ने उन्हें याद दिलाया कम्युनिस्टों का अंतिम संस्कार कैसे किया जाता है. इसके बाद चंद्र सिंह गढ़वाली ने दोनों शहीदों के कफन खोल दिये. उनके शरीर पर हंसिया हथौड़ा वाला लाल झंडा था. गढ़वाली ने झंडों को अपने हाथ से उठाया और उन्हें अंतिम सलामी दी. 

इस अंतिम संस्कार के बाद चंद्र सिंह गढ़वाली और परिपूर्णानंद पैन्यूली ने घोषणा की ‘अब टिहरी आजाद है.’ सब ने हाथ उठाकर आजाद टिहरी के लिये प्रतिज्ञा ली. इसी शाम टिहरी के बाजार में प्रजा मंडल के ऑफिस के सामने विराट जनसभा हुई. इन क्रांतिकारियों के टिहरी पहुंचने से एक दिन पहले ही राजा नरेंद्र शाह अपनी रानी के साथ नरेंद्र नगर भाग चुके थे. राहुल सांकृत्यायन अपनी किताब में लिखते हैं, ‘राजा के बड़े बेटे मानवेंद्र शाह चाहते थे कि प्रजा की मांगों को ठुकराया न जाए. लेकिन उनके पिता उनकी कुछ भी सलाह सुनने को तैयार नहीं थे. इससे नाराज होकर मानवेंद्र शाह दिल्ली चले गये. जहां वे देश के पहले गृह मंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल के अधीन काम सीख रहे थे.’

उधर, क्रांति की प्रक्रिया के बीच खबर उड़ने लगी कि राजा बड़ी फौज लेकर नरेंद्र नगर से टिहरी की तरफ आ रहे हैं. यह सुनते ही आजाद हिंद फौज की प्लाटून ने भगीरथी नदी पर बने पुल पर मोर्चा संभाल लिया. कुछ ही घंटों बाद राजा नरेंद्र शाह अपनी रॉल्स रॉयल कार में रानी के साथ बिना पुलिस पलटन के आते हुए दिखे. पुल पर क्रांतिकारियों ने बैरिकेटिंग कर ताला लगा दिया था. राजा कार से उतरे और उन्होंने ताला खोलने को कहा. क्रांतिकारियों ने इससे साफ इंकार कर दिया. राजा को ये सुनकर बड़ी जोर का झटका लगा. झटका इसलिए क्योंकि सदियों से सामंती ठसक में जीने वाले राजा ने पहली बार प्रजा से न शब्द सुना था. 

बताते हैं कि राजा ने क्रांतिकारियों से गढ़वाली में कहा, ‘मिथें तीस लगीं च. मैंते पाणी पिले द्या.’ यानी मुझे प्यास लगी है, मुझे पानी तो पिला दो. और ये कहकर राजा बैरिकेटिंग पर चढ़ते हुए दूसरी तरफ जाने की कोशिश करने लगे. लेकिन उनकी रानी ने उन्हें ऐसा करने से रोका और फिर राजा नरेंद्र शाह ने अपनी कार में बैठने से पहले आखिरी बार अपने पूर्वज कनकपाल द्वारा स्थापित की गई रियासत को एकटक निहारा और चुपचाप नरेंद्रनगर लौट गए. इस घटना के साथ ही टिहरी अधिकारिक रूप से आजाद घोषित हो गया.

16 जनवरी की आज़ाद सुबह महावीर त्यागी, भक्त दर्शन, नरदेव शास्त्री जैसे दूसरे नेता भी टिहरी पहुंच गए. वहां करीब 15 हजार लोग सभा में मौजूद थे. दौलत राम को टिहरी का प्रधानमंत्री घोषित किया गया. उस सभा में उन्होंने चार बड़ी घोषणायें की. पहली, सारे कैदी छोड़े जाते हैं. दूसरी, राज्य की संपत्ति को जनता की सरकार अपने हाथ में लेती है. तीसरी, तार द्वारा इस क्रांति की सूचना भारत सरकार को भेज दी जाए. और चौथी, जनता के ऊपर जो भी कर्ज है, उसे माफ किया जाता है. 

क्रांतिकारियों की ये सरकार करीब दो साल तक चली और फिर अगस्त 1949 में टिहरी रियासत का भारत में विलय हुआ.
 

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