सांस्कृतिक और सामाजिक चेतना का त्योहार है ‘उत्तरायणी’
काले कव्वा काले, घुघुती माला खाले.
ले कव्वा बड़, मैंके दिजा सुनौंक घ्वड़.
ले कव्वा ढाल, मैंके दिजा सुनक थाल.
ले कोव्वा पुरी, मैंके दिजा सुनाकि छुरी.
ले कौव्वा तलवार, मैंके दे ठुलो घरबार.
‘ब्यांणी तार’ ने अभी-अभी विदाई ली है. सुबह होने में अभी कुछ देर है. ‘ततवांणी’ यानी गर्म पानी से रात को नहाने के बाद गांव वालों ने पूरी रात जागरण किया है. अब सभी को बेसब्री से इंतजार है पौ फटने का. सर्द रात के बाद सुबह पूरी घाटी पाले से सफ़ेद हो गई है. मानो किसी ने रात को आकर सफेद चादर बिछा दी हो. कई जगह तो पानी जमकर ‘खांकर’ बन गया है. ‘उत्तरायणी’ में रात को गरम पानी और सुबह नौलों में ठंडे पानी से नहाना पुण्य माना जाता है. जहां नदी पास हो, वहां ‘गंग नहाना’ हो जाता है. प्रकृति के बीच रहने वाले लोगों के लिए सभी जलधाराएं गंगा ही हुई. फिर जब ‘उत्तरायणी’ में सुबह नहाना ही हुआ तो इंतजार किसका? सभी लोग अपने घरों के आस-पास नदी-नौलों में नहाने वाले हुए. लेकिन वो तो कई सागर, कई देश, कई गंग, कई शहर-गांव लांघ के आ रहा होगा. रात भर से चला होगा. सुबह उसे सबके घर जो पहुंचना हुआ. बागेश्वर से नहाकर आ रहा होगा वो दुलारा कौवा. उसे जल्दी आने का आग्रह किया जा रहा है. गांवों की हर बाखली-घर से सुबह-सुबह बच्चों के सामूहिक स्वर उभरने लगे हैं- ‘काले कव्वा काले, घुघुति माला खाले।’
नमस्कार में हूँ उदिता देवरानी और आप देख रहे हैं बारामासा का कार्यक्रम डांडी-कांठी. आज बात करेंगे प्रकृति के रंगों को आत्मसात करते, हमारी चेतना के त्योहार ‘उत्तरैणी’ की.
‘मकर संक्राति’ के रूप में ‘उत्तरायणी’ पूरे देश में मनाई जाती है. अलग-अलग प्रान्तों और समाजों में इसके अनेक रूप हैं. हिमालय और देश की जीवनदायिनी नदियों का उद्गम स्थल होने से ‘उत्तरायणी’ देश की सांस्कृतिक समरसता का अद्भुत त्योहार है. असल में यह पहाड़ की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक चेतना का भी त्योहार है.
(पप्पू कार्की का गीत ‘उत्तरैणी कौतिक लैरो सरयू का बगड़ मा…. ’)
भारतीय परंपरा में ‘मकर संक्रान्ति’ को सूर्य के उत्तर दिशा में प्रवेश के रूप में मनाया जाता है. उत्तराखंड में इसे कुमाऊं में ‘उत्तरायणी’ और गढ़वाल में ‘मकरैणी’ कहा जाता है. पहाड़ के अलग-अलग हिस्सों में इसे कई नामों से जाना जाता है. जैसे घुगुतिया, पुस्योड़िया, मकरैण, मकरैणी, उतरैणी, उतरैण, घोल्डा, घ्वौला, चुन्या त्यार, खिचड़ी संग्रांत आदि. इस दिन सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है, इसीलिए इसे ‘मकर संक्रान्ति’ या ‘मकरैण’ कहा जाता है.
सौर चक्र में सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर चलता है, इसलिये इसे ‘उत्तरैण’ या ‘उत्तरायणी’ भी कहा जाता है. ये हमारे लिए सिर्फ़ ऋतु का त्योहार ही नहीं बल्कि हमारी नदियों के संरक्षण की चेतना का उत्सव भी है. उत्तरकाशी में इस दिन से शुरू होने वाले माघ मेले से लेकर सभी प्रयागों और नदियों में लोग पहली रात जागरण कर सुबह स्नान करते हैं.
(गढ़वाली लोक गीत मकरैंणी पर आधारित)
कुमाऊं में ‘उत्तरायणी’ को ‘घुघुतिया त्यार’ के रूप में मनाया जाता है. इसकी पहली शाम को आटे और गुड़ को मिलाकर ‘घुघुते’ बनाने का रिवाज है. आटे के खिलौने, तलवार, डमरू के साथ इन्हें फूल और फलों की माला में पिरोकर बच्चे गले में डाल लेते हैं और गाते हैं:
काले कव्वा काले, घुघुती माला खाले.
ले कव्वा बड़, मैंके दिजा सुनौंक घ्वड़.
ले कव्वा ढाल, मैंके दिजा सुनक थाल.
ले कोव्वा पुरी, मैंके दिजा सुनाकि छुरी.
ले कौव्वा तलवार, मैंके दे ठुलो घरबार.
ये बच्चे कौवों को ही क्यों आमंत्रित करते हैं? इसकी कई सारी लोक कहानियां हैं. इनमें सबसे चर्चित कहानी ये है कि कत्यूर घाटी के रणचूलाकोट में रणवीर सिंह नाम का एक राजा रहता था. उसका एक बेटा था हरिमन जिसे पक्षियों से बहुत प्यार था. वो महल के आस-पास के पेड़ों में आने वाली सभी चिड़ियाओं को दाना दिया करता था.
इस राजकुमार को घुघुती चिड़िया सबसे प्यारी लगती थी. लेकिन एक कौवे को ये बिलकुल पसंद नहीं था. वो चाहता था कि हरिमन सिर्फ़ उसी से दोस्ती रखे इसलिए वो घुघुती से हमेशा चिढ़ा रहता.
राजा का एक मंत्री जिसकी नजर राजगद्दी पर थी. वो राजकुमार को रास्ते से हटाकर ख़ुद राजा बनना चाहता था. एक दिन वो राजकुमार को चिड़िया दिखाने के बहाने जंगल ले गया. लेकिन वहां पद्म के पेड़ पर बैठे कौवे ने मंत्री के षड़यंत्र को भांप लिया और वो कांव-कांव करता हुआ महल के चक्कर काटने लगा. जब किसी ने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया तो वो रानी का हार लेकर जंगल की ओर उड़ा. तमाम सैनिक भी कौवे के पीछे जंगल की ओर भागे. कौवे ने देखा कि मंत्री ने हरिमन को एक पेड़ से बांध दिया है. उसने वहीं वो हार गिराया और पेड़ पर बैठकर कांव-कांव करने लगा. हार देखकर मंत्री घबरा गया और राजकुमार को वहीं छोड़कर भाग गया. पीछे से आ रहे सिपाहियों ने राजकुमार के बंधन खोले और मंत्री को पकड़ लिया.
कौवे के इस उपकार से राजा बहुत खुश हुआ. उसने कौवे से पूछा कि उसे ईनाम में क्या चाहिए? कौवे ने सोचा कि घुघुती को हटाने और राजकुमार से दोस्ती करने का इससे अच्छा मौक़ा नहीं हो सकता. उसने राजा से कहा कि राज्य में कौवों को सभी पक्षियों से ज़्यादा सम्मान मिलना मिले और पूरी प्रजा को भोज में घुघुती पक्षी खिलाया जाए.
इस पर हरिमन ने कहा कि निर्दोष घुघुती की जान लेना ठीक नहीं है. घुघुती तो किसानों की भी दोस्त होती है. वो उनकी खेती को कोई नुकसान नहीं पहुंचाती और फसल बर्बाद करने वाले कीड़ों को भी समाप्त कर देती है. लिहाज़ा राजा ने बीच का रास्ता निकाला और सभी नागरिकों को संदेश भिजवाया कि आज से मकर संक्रान्ति के दिन पद्म वृक्ष की पूजा होगी और कौवों को सम्मानपूर्वक आटे से बने घुघतों का भोज कराया जाएगा. राजा का संदेश उसी दिन कई इलाकों में पहुंच गया. जहां ये संदेश दूसरे दिन पहुंचा वहां ये त्योहार दूसरे दिन मनाया जाता है.
लोक में कुछ कहानियाँ और भी प्रचलित हैं. इनमें एक तो चंद राजाओं के समय की है. कहा जाता है कि राजा कल्याण चंद के बेटे निर्भय चंद का अपहरण राजा के एक मंत्री ने कर लिया था. उस मंत्री ने राजकुमार को जहां छुपाया, उसका भेद एक कौवे ने देख लिया और राजा को इसकी खबर दे दी. इससे खुश होकर राजा ने कौवों को मीठा खिलाने की परंपरा शुरू की.
ऐसी ही एक कहानी ये भी है कि पुरातन काल में एक राजा को ज्योतिषियों ने बताया कि उस पर मारक ग्रह दशा है और अगर वो ‘मकर संक्रान्ति’ के दिन बच्चों के हाथ से कौवों को घुघुती का भोजन कराये तो उसकी ग्रह दशा सुधार जाएगी. लेकिन राजा अहिंसावादी था इसलिए उसने उसने आटे की प्रतीकात्मक घुघुती बच्चों के हाथों कौवों को खिलाई और तभी से ये परंपरा चल पड़ी.
गढ़वाल में ‘उत्तरायणी’ को ‘मकरैणी’ के नाम से जाना जाता है. कई जगह इसे ‘चुन्या त्यार’ भी कहते हैं. इस दिन दाल, चावल और झंगोरा जैसे सात अनाजों को पीसकर एक विशेष व्यंजन तैयार किया जाता है जिसे ‘चुन्या’ कहते हैं. इस दिन उड़द की खिचड़ी ब्राह्मणों को खिलाने का भी चलन है और इसलिए इसे ‘खिचड़ी संग्रांत’ भी कहा जाता है.
कहीं-कहीं घुघतों की तरह ही आटे के मीठे ‘घोल्डा/घ्वौलों’ यानी हिरन भी बनाए जाते हैं और इसलिए इस त्योहार को ‘घल्डिया’ या ‘घ्वौल’ भी कहते हैं.
‘उत्तरायणी’ के दिन पौड़ी जिले के द्वारीखाल विकासखंड के डाडामंडी, थलनद़ी, सांगुडा और भुवनेश्वरी में ‘गिंदी कौथिग’ का आयोजन भी होता है. दूर-दूर से लोग इस मेले में शामिल होने आते हैं.
पौड़ी जिले में अजमेर और उदयपुर पट्टी के बीच लगने वाला ‘गिंदी कौथिग’ गढ़वाल के प्राचीन मेलों में से एक है. जनश्रुति है कि महाभारत काल में पांडव अज्ञातवास के दिनों में महाबगढ़ी में रहते थे. जब कौरव सेना उन्हें ढूंढती हुई कस्याली गांव के पास पहुंची तो उसने पांडवों को देख लिया. तब दोनों के बीच भीषण मल्ल युद्ध हुआ. कालांतर में यही ‘गिंदी कौथिग’ के रूप में मनाया जाने लगा.
डाडामंडी का ‘गिंदी मेला’ भी काफी पुराना और लोकप्रिय है. बताते हैं कि 1887 में मूल रूप से कुमाऊं के रहने वाले पंडित छवाण राम बौंठ गांव में बस गए थे. उन्होंने ही मकर संक्राति के दिन सबसे पहले बौंठ और डंडेख गांव के लोगों के बीच गिंदी का खेल आयोजित किया. बाद में भटपुड़ी और लंगूर पट्टी में भी यह खेल लोकप्रिय हुआ. लंगूर पट्टी और मन्यारस्यूं पट्टी के लोग सांगुणा के सैंण में नयार नदी के किनारे इस मेले को आयोजित करते हैं. मणिदीप में मां भुवनेश्वरी के थान में भी ‘गिन्दी मेला’ खेला जाता है. कोटद्वार के पास मवाकोट में भी साल 1905 में हरेंद्र जयदेव जोशी ने इस मेले की शुरुआत की. मालन नदी के दोनों तरफ के लोग इसमें हिस्सा लेते हैं.
‘गिंदी का मेला’ या ‘गिंदी कौथिग’ गढ़वाल में वीरता और सौंदर्य का प्रतीक है. चार कंगनों वाली करीब पंद्रह किलो की वो गेंद अपने आप में अनोखी होती है जिससे ये खेल खेल जाता है. बकरी की खाल से बनाई जाने वाली इस गेंद में मेले से कुछ दिन पहले एक जाति विशेष के लोग कमेडू भरते हैं. गेंद का वजन इसलिए भारी रखा जाता है कि उसे ज़्यादा दूर तक न फेंका जा सके. इस गेंद को दो पट्टियों के लोगों के बीच रखा जाता है. फिर जिस पट्टी के लोग इसे सीमा के पार फेंकते हैं उन्हें विजयी घोषित किया जाता है. बाद में इस गेंद को वहीं जमीन में गाड़ दिया जाता है.
‘उत्तरायणी’ का जहां सांस्कृतिक महत्व है, वहीं ये हमारी चेतना और संकल्पों को मजबूत करने वाला त्योहार भी है. परंपरागत रूप से मनाई जाने वाली ‘उत्तरायणी’ ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जन चेतना की अलख जगाने का भी काम किया. अंग्रेजी शासन में ‘कुली बेगार’ की एक बेहद क्रूर प्रथा थी. अंग्रेज जहां से भी गुजरते, किसी भी पहाड़ी को अपना ‘कुली’ बना लेते. इसके एवज में वो पगार तक नहीं देते थे.
इस प्रथा के खिलाफ विरोध शुरू हुआ और धीरे-धीरे इसने संगठित रूप लेना शुरू किया. कुमाऊं केसरी बद्रीदत्त पांडे के नेतृत्व में 14 जनवरी, 1921 के दिन बागेश्वर के ‘उत्तरायणी’ मेले में हजारों लोग इकट्ठा हुए. इन लोगों ने सरयू-गोमती नदी के संगम का जल उठाकर संकल्प लिया कि ‘हम कुली बेगार नहीं देंगे.’ इस प्रकार एक बड़ा आंदोलन अंग्रेजों के खिलाफ खड़ा हुआ और हजारों लोगों ने उसी दिन ‘कुली रजिस्टर’ सरयू नदी में फेंक दिए. इस आंदोलन के सूत्रधारों में बद्रीदत्त पांडे, हरगोविन्द पंत, मोहन मेहता, चिरंजीलाल और विक्टर मोहन जोशी महत्वपूर्ण थे. महात्मा गांधी ने इस घटना को ‘रक्तहीन क्रांति’ कहा और जन कवि गौर्दा ने अपनी प्रसिद्ध कविता इसी पर गाई, ‘मुलुक़ कुमाऊँ का शुनि लियो यारों – झन दिया झन दिया कुली बेगार.’
कुली बेगार के खिलाफ बागेश्वर से शुरू हुआ आंदोलन फिर पूरे पहाड़ में फैला.
30 जनवरी 1921 को गढ़वाल के चमेठाखाल में बैरिस्टर मुकन्दी लाल के नेतृत्व में ये आंदोलन आगे बढ़ा. खल्द्वारी के ईश्वरीदत्त ध्यानी और बंदखणी के मंगतराम खंतवाल ने मालगुजारी से त्यागपत्र दिया. गढ़केसरी अनुसूया प्रसाद बहुगुणा के नेतृत्व में भी आंदोलन हुआ और बाद में इलाहाबाद में पढ़ रहे गढ़वाल के छात्रों ने भी अपने-अपने गांव लौटकर इस आंदोलन को आगे बढ़ाया. इनमें भैरव दत्त धूलिया, भोला दत्त चंदोला, जीवानन्द बडोला आदि प्रमुख थे.
उत्तरायणी का ही संकल्प था कि पहली बार यहां की महिलाओं ने अपनी देहरी लांघकर आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा लिया. कुन्तीदेवी और बिसनी साह जैसी महिलायें आंदोलन का नेतृत्व करने लगी और गीत बने कि
अपना गुलामी से नाम कटा दो बलम,
तुम स्वदेशी नाम लिखा दो बलम.
मैं भी स्वदेशी प्रचार करूंगी,
मोहे परदे से अब तो हटा दो बलम.
ये एक बड़ी चेतना का आगाज था, जिसने बाद में महिलाओं को सामाजिक जीवन में आगे आने का आकाश दिया. बिशनी साह ने कहा कि ‘सोने के पिंजरे में रहने से अच्छा, जंगल में रहना है.’
एक और गीत उस दौरान बड़ा लोकप्रिय हुआ जो कहता था
‘घाघरे गुनी, बाजरौ रव्ट,
सरकारक उजड़न ऐगो,
डबल में पड़गो ट्वट.
आजादी के बाद हुए आंदोलनों में भी ‘उत्तरायणी’ लोगों का मार्गदर्शन करती रही है. सत्तर के दशक में जब जंगलात कानून के खिलाफ आंदोलन चला तो आंदोलनकारियों ने उत्तरायणी के अवसर पर ही संकल्प लिए. ‘आज हिमाल तुमन कै ध्यतौंछ, जागो-जागो हो मेरा लाल’ जैसे जनगीतों का आगाज हुआ.
फिर अस्सी के दशक में जब ‘नशा नहीं, रोजगार दो’ आंदोलन चला तो भी इसी ‘उत्तरायणी’ से आंदोलन के स्वर मुखर हुए. 1987 में जब भवदेव नैनवाल ने भ्रष्टाचार के प्रतीक ‘कनकटै बैल’ को प्रधानमंत्री राजीव गांधी के सामने पेश करने के लिये दिल्ली रवाना किया तो बागेश्वर से ही संकल्प लिया गया.
उत्तराखंड आंदोलन के शुरुआती दौर में हर साल नई चेतना के लिये आंदोलनकारी बागेश्वर के ‘उत्तरायणी’ मेले में आए. यहां की राजधानी गैरसैंण बनाने के लिये संकल्प-पत्र और वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली के नाम पर गैरसैंण का नाम ‘चन्द्रनगर’ रखने का प्रस्ताव भी 1992 में यहीं से पास हुआ. तभी जन कवि ‘गिर्दा’ ने उत्तराखंड आंदोलन को स्वर देते हुए कहा,‘उत्तरैणी कौतिक ऐगो, वैं फैसल करूंलों. उत्तराखंड ल्हयूंल हो दाज्यू, मन कशों बनौलौ.’
’
जनवरी 1921 से आज तक सरयू-गोमती के संगम में ‘उत्तरायणी’ के अवसर पर जन चेतना के लिये राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों का जमावड़ा रहता है. इसीलिए ‘उत्तरायणी’ उत्तराखंड में राजनीतिक-सामाजिक चेतना का भी त्योहार है. इस साल देश की आज़ादी के 75 साल पूरे हो रहे हैं और ‘कुली बेगार आंदोलन’ का ये शताब्दी वर्ष है, इसलिए इस बार की उत्तरायणी की प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है. आप सभी को इसकी ढेर सारी बधाई.