कानूनी तौर से देखा जाए तो शंभू पासवान के निर्वाचन पर उठ रहे सवाल आधार-हीन नहीं हैं और इस मामले में जो भी फैसला आएगा, वो आगे भी कई मामलों के लिए नज़ीर बनेगा. उनका निर्वाचन रद्द होता तब भी और निर्वाचन सही पाया जाता है तब भी, ये फैसला प्रदेश में अनुसूचित जाति के आरक्षण के सम्बंध में मील का पत्थर साबित हो सकता है.